सचिव लेवल का पद कभी बाबू तो कभी फार्मासिस्ट को -उत्तराखंड चिकित्सा परिषद, कार्यकारी रजिस्ट्रार

Share Now

उत्तराखंड प्रदेश में आयुर्वेद चिकित्सकों को भले ही एलोपैथिक के समान दर्जा देते हुए समान वेतन मान दे दिया गया हो किंतु वास्तव में ऐसा नही है, भले ही आपकी दिनचर्या की सुरुवात आयुर्वेद से हो पर वर्षों से भुलाई गयी इस विधा को स्वीकारने में अभी भी नीति नियंताओं को तकलीफ हो रही है,

अब कोरोना ड्यूटी की बात हो अथवा भारतीय चिकित्सा परिषद में कार्यकारी रजिस्टर के पद को भरने की बात, सचिव लेवल का यह पद कभी बाबू से तो कभी फार्मासिस्ट से भरा जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि पूरे प्रदेश में 4000 लगभग योग्य आयुर्वेद चिकित्सक जिनमें एमडी आयुर्वेद और पीएचडी धारक भी मौजूद है , उसके बावजूद भी रजिस्ट्रार के पद पर बाबू अथवा फार्मासिस्ट को रखकर किसका उल्लू सीधा हो रहा है?

दरअसल पूरा मामला अध्यक्ष पद पर नामित राज्यमंत्री के चयन के बाद हो रहा है जहां आयुर्वेद डॉक्टर अपने साथ हो रहे भेदभाव को लेकर आवाज उठाते हैं तो उनकी आवाज दबाने के लिए और उन्हें अपनी हद में रहने के लिए इस तरह के गुलामी के दौरान ब्रिटिश हुक्मरानो की तरह फरमान जारी किए जा रहे है

गिरीश गैरोला

भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड में पिछले कई माह से अनियमित कार्यों और आयुष चिकित्सकों के हितो के विरोध में जो कार्य किये जा रहे हैं उससे आयुष चिकित्सा पद्धति की देश मे छवि धूमिल होती जा रही है।

इसी कड़ी में अब इस परिषद में कार्यकारी रजिस्ट्रार का पद फार्मासिस्ट को दिया गया है जो कि किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। जो कि सम्भवतः देश मे कहीं भी आज तक नहीं हुआ होगा। वो काम भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड में किए जा रहे हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि यह कार्य व्यक्तिगत स्वार्थ के वशीभूत होकर अनियमित कार्यों को करवाने की मंशा से और आयुर्वेद चिकित्सकों को अपमानित करने के लिए किया गया है।

आयुर्वेद चिकित्सकों का कहना है कि क्या परिषद को हज़ारों की संख्या में रजिस्टर्ड आयुर्वेद चिकित्सकों में से एक भी योग्य चिकित्सक नहीं मिला जो इस पद को संभाल सके?

आयुर्वेद चिकित्सकों का मानना है कि जिस चिकित्सा परिषद में BAMS, MD, PhD आयुर्वेद की डिग्री वाले उच्च शिक्षित चिकित्सकों का रजिस्ट्रेशन किया जा हो, क्या उस परिषद का रजिस्ट्रार पद एक फार्मासिस्ट को दिया जाना उचित प्रतीत होता है?

यदि उच्चाधिकारियों को हज़ारों योग्य आयुर्वेद चिकित्सकों(वैद्यों) की जगह फार्मासिस्ट का रजिस्ट्रार के पद पर आसीन करना उचित प्रतीत होता है तो सम्भवतः CCIM जो इन सभी संस्थाओं की मातृ एवं केन्द्रीय संस्था है उसके रजिस्ट्रार और अध्यक्ष पर भी फार्मासिस्ट को ही आसीन करवा दिया जाय

राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ, उत्तराखण्ड(पंजीकृत) के प्रदेश मीडिया प्रभारी डॉ० डी० सी० पसबोला द्वारा बताया गया कि इस निर्णय से हर बार की तरह पूरे देश मे उत्तराखंड के भारतीय चिकित्सा परिषद की छवि धूमिल हो रही है, इसलिये इस निर्णय को तुरन्त बदल के किसी आयुर्वेद चिकित्सक को रजिस्ट्रार पद पर नियुक्त करने के आदेश दिलवाने की कार्यवाही सरकार को करनी चाहिए।

इस परिषद के अध्यक्ष की भूमिका हर विवादित निर्णय में शामिल होती है। इस अध्यक्ष के रहते सबका यह मानना है कि आने वाले समय मे भी स्वार्थ के वशीभूत होकर ऐसे ही गलत निर्णय लिए जाने की संभावना है। अत: परिषद के अध्यक्ष पद पर भी किसी योग्य और ईमानदार व्यक्ति को नियुक्त करवाने की कार्यवाही करने की जानी चाहिए।

इस सम्बन्ध में राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ, उत्तराखण्ड, के , प्रान्तीय उपाध्यक्ष डॉ० अजय चमोला, भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड के निर्वाचित सदस्य डॉ० महेंन्द्र राणा(गढ़वाल क्षेत्र), डॉ० चन्द्रशेखर वर्मा(हरिद्वार क्षेत्र), डॉ० हरिद्वार शुक्ला(कुमाऊं क्षेत्र) द्वारा राज्यपाल, मुख्यमंत्री, आयुष मंत्री एवं आयुष सचिव को कड़ा पत्र लिखकर इस सर्वथा अनुचित निर्णय पर घोर आपत्ति एवं पुरजोर विरोध जताया गया है एवं इस शासनादेश को तत्काल निरस्त करने और इस पद पर सुयोग्य, वरिष्ठ एवं अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी की नियुक्ति करने की मांग की गयी है।

error: Content is protected !!