उत्तरकाशी के गाजना पट्टी अंतर्गत न्यू गांव में क्वॉरेंटाइन के लिए सरकारी भवन न होने के चलते प्रवासी उत्तराखंड यों को गांव से 4 किलोमीटर दूर जंगल के बीच रात के घुप्प अंधेरे में जंगली जानवरों के खतरे के साए में अपने मासूम बच्चों के साथ टाइम काटने की मजबूरी है, जिलाधिकारी उत्तरकाशी को सूचना भेजने के बाद आपदा प्रबंधन एक फोन पर जानकारी लेने के बाद चुप्पी साध गया। अब सवाल यह है कि कोरोनावायरस से बच भी गए तो जंगली जानवरों से कौन बचाएगा।
जय सिंह असवाल
कोरोना वायरस से बच भी गया तो भालू और अन्य जंगली जानवरों से जीवन को बराबर खतरा बना हुआ है। सिर्फ एक राय सिंह की कहानी नहीं है बल्कि उसके साथ उसकी पत्नी और 3 बच्चे भी डर के साए में रात काटने को मजबूर हैं । दिन के उजाले में कोरोनावायरस के फैलने का डर तो रात के अंधेरे में भालू और जंगली हिंसक जानवरों के हमले का खतरा ।

राय सिंह ने बताया कि 16 मई को उत्तरकाशी जिले के न्यू गांव में बाहरी प्रदेशों से कई प्रवासी आए जिन्हें अलग-अलग स्थानों पर क्वॉरेंटाइन कराया गया। इसी में रायसिंह जो जयपुर से 16 मई को गांव पहुंचा इस परिवार को अस्थाई तैयार क्वॉरेंटाइन सेंटर में जगह न होने के चलते उसे गांव से 4 किलोमीटर दूर जंगली इलाके में एक गौशाला में रहने को कहा गया है , जहां कोई लाइट नहीं है। लकड़ी के छिलके जलाकर उसके उजाले की रोशनी से बाहर निकल कर टॉयलेट्स आदि कार्य करने होते है।

टॉयलेट के लिए रात को बाहर आने में भालू और अन्य हिंसक जानवरों का खतरा बराबर बना हुआ है । रायसिंह ने जिलाधिकारी उत्तरकाशी के नाम एक एप्लीकेशन लिख कर व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड करवाई जिसके बाद आपदा प्रबंधन से एक फोन आया और उनसे लोकेशन मांगी गई किंतु उसके बाद भी कोई मदद नहीं मिल सकी, अब रायसिंह कोरोनावायरस और जंगली हिंसक जानवरों के खौफ के बीच दिन और रात अपने मासूम बच्चों के साथ रतजगा करने को मजबूर है।
राय सिंह ने बताया कि उसने ग्राम प्रधान से सोलर लाइट की मांग की थी किंतु से अनुमति ना होने की वजह से अस्वीकार कर दिया गया है।
रायसिंह लिखते हैं।

ऐसा नहीं है कि बाकी के प्रवासी बहुत अच्छी जगह रह रहे हैं लेकिन वह जहां रह रहे हैं वह गांव के पास है।
वैसे मेरे गांव में चार छानियों में लोग रह रहे हैं लेकिन बाकी छनिया गांव के पास है तो उन्होंने किसी तरह लाइट की व्यवस्था कर दी है
1- राय सिंह – छेरया बन में -5 सदस्य
2- महेश रावत व देव सिंह – चरगाड़ की छानी
3- पंकज – गांव के पास छानी में
4- मनमोहन – कांगड़ में छप्पर बनाकर रह रहा ।
इस सभ्य और संवेदनशील समाज में अपने अपनों से इतनी भी मदद आपदा में न मिलें तो दुख तो होता ही है।
