देश को न तोड़ सका तो भगवान को बांटने की कोशिश में कोविड-19 – छोटा भगवान बड़ा भगवान -ईश्वर एक है

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कोविड-19

कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. प्रदेश में मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी के कारण स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है. अभी तक कोरोनावायरस कोविड-19 का किसी भी पैथी में कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है लिहाजा पारंपरिक अथवा सिम्टम्स के आधार पर ही मरीज का इलाज किया जा रहा है । ऐसे में जब एलोपैथिक की कोई शल्य चिकित्सा नहीं अपनाई जानी है सिर्फ वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन द्वारा अथवा अभी तक रिसर्च के गए डॉक्टर्स के द्वारा निर्धारित दवाओं से ही इलाज किया जाना है तो फिर एलोपैथी और आयुष में फर्क का कोई औचित्य समझ नहीं आता है क्योंकि शरीर विज्ञान और शरीर की कार्यप्रणाली दोनों पैथि में समान रूप से पढ़ाई जाती है । इसके अलावा लीवर संबंधी कई ऐसे उपचार हैं जिसमें एलोपैथी के डॉक्टर आयुर्वेदिक दवाओं का खुलकर अपने प्रिस्क्रिप्शन में उपयोग करते हैं तब एलोपैथिक डॉक्टर द्वारा आयुर्वेदिक दवाओं के उपयोग को लेकरकोई सवाल खड़ा नहीं होता ? देश और प्रदेश में भी जब सरकारें स्वीकार कर चुकी हैं और उसी अनुरूप आयुष और एलोपैथी को समान रूप से वेतन दिया जा रहा है तो ऐसे में आउट सोर्स पर आपदा के इस दौर में दोनों में वेतन की विसंगति आखिर किस लिए। हकीकत यह है की योगा और प्राकृतिक चिकित्सा के अनुभव के बाद यह बात सिद्ध हो चुकी है आयुर्वेद जीवन पद्धति अपनाए जाने से रोगों के पैदा होने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती है।

गिरीश गैरोला देहरादून

इसकी सबसे बड़ी वजह प्रदेश में
डॉक्टरों​ की कमी मानी जा रही है, इससे निपटने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन(एन एच एम)के अन्तर्गत जिला स्तर पर प्रदेश में तीन माह के लिए डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन आउटसोर्स कंपनी के माध्यम से से जारी किया है. विज्ञापन में एमबीबीएस डॉक्टरों का वेतन 60 हजार रुपए एवं बीएएमएस और बीएचएमस डॉक्टरों के लिए मात्र 25 हजार रूपए प्रतिमाह वेतन तय किया गया है. आयुष डॉक्टरों ने इसका विरोध किया है और कहा है कि सरकार आयुष डॉक्टरों के जान की कीमत मात्र 25 हजार मानी है. आयुष डॉक्टरों​ का कहना है कि जो काम एमबीबीएस डॉक्टर करेंगे, वही काम आयुष डॉक्टर भी करेंगे, फिर यह भेदभाव क्यों?

राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ के प्रदेश मीडिया प्रभारी डॉ० डी० सी० पसबोला ने इस प्रकार से वेतन निर्धारण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि क्या आयुष डॉक्टरों की जान की कीमत मात्र 25 हजार है. आयुष डॉक्टरों को भी एमबीबीएस डॉक्टरों​ के बराबर मानदेय रखा जाना चाहिए.

डा० पसबोला ने कहा है कि ज्यादातर राजकीय एवं प्राइवेट आयुष डॉक्टर इस विपत्ति में जनमानस की सेवा को प्राथमिकता दे रहे हैं. यहां तक की फ्रन्टलाइन कोरोना वारियर की भूमिका निभा रहे हैं. इसी क्रम में जिला प्रशासन की ओर से जिलाधिकारी देहरादून द्वारा आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी एवं सुद्धोवाला, देहरादून क्वारंटाइन सेंटर के प्रभारी डॉ० अश्विनी कौशिक को बेस्ट कोरोना वारियर चुना गया है. जो कि आयुष डॉक्टरों की कोरोना की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका साबित करता है.

आयुष डॉक्टरों ने मुख्यमंत्री, डीजी हैल्थ, मिशन निदेशक एन एच एम एवं सभी जिले के सीएमओ से इस मामले में हस्तक्षेप कर सरकार से मांग की है कि गंभीर होकर आयुष डॉक्टरों का का वेतन भी 60 हजार किया जाए.

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