एक दौर था जब उत्तरखंडी समुदाय के लोग अपनी परमपरा और रीति रिवाज को पिछड़ेपन की निशनी मानकर छिपाने का प्रयास करते थे और एक आज का दौर है जब पढे लिखे और सम्पन्न परिवार के उत्तरखंडी, हर मौके पर खुद को उत्तरखंडी बताने मे गर्वह का अनुभव करते है , और इसी कड़ी को आगे बढ़ते हुए अपनी रीति रिवाज और परम्पराओ को आगे बढ़ाने का काम कर रहे है |
वर्षो से भुला दी गयी इगास बूढ़ी दिवाली को इस वर्ष सीएम धामी द्वारा अवकाश घोषित किए जाने के बाद त्योहार पर सिर्फ छुट्टी मनाने के अलावा भी लोगो ने बढ़ चढ़ कर इस उत्सव को मनाया | बदलाव के इस दौर को नयी पीढ़ी ने भी गर्व के साथ स्वीकार किया है |
कहा जाता है कि 17वीं सदी में जब वीर भड़ माधो सिंह भंडारी तिब्बत की लड़ाई लड़ने गए थे, तब लोगों ने दीपावली नहीं मनाई थी। लेकिन जब वह रण जीतकर लौटे, तो दीयों से पूरे क्षेत्र को रोशन कर इगास का पर्व दीपावली के रूप में मनाया गया। तभी से इगास (बूढ़ी दीपावली) धूमधाम से मनाई जाती है। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में विकासखंड कीर्तिनगर का मलेथा गांव वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की त्याग, तपस्या और बलिदान की कहानी से जुड़ा है।
उत्तराखंड: इगास पर्व पर 15 नवंबर को अवकस घोषित किया गया है |
गढ़वाल की सेना के युद्ध में जाने की वजह से यहां दीपावली के दिन घरों में दीपक नहीं जले। कार्तिक एकादशी के दिन जब माधो सिंह भंडारी अपनी सेना के साथ लड़ाई जीत कर लौटे तो पूरे राज्य में इगास का त्योहार दीपावली की तर्ज पर मनाया गया। वीर माधो सिंह भंडारी ने जिस कृषि भूमि के लिए करीब 80 मीटर सुरंग का निर्माण कर अपने पुत्र का भी बलिदान दे दिया, आज वह उपजाऊ भेले ही वह कृषि भूमि सिमटने लगी है। किन्तु धीरज वाली बात ये है कि नई पीढ़ी अपने आप को उत्तरखंडी कहलाने मे शर्म नहीं गौरव का अनुभव करने लगी है |
