👉 देहरादून पुलिस की बड़ी कार्रवाई, एक गिरफ्तार, तीन फरार
🎭 किन्नर नहीं, चालाक चोर थे!
सांई लोक कॉलोनी में गृहप्रवेश की खुशी मातम में बदल सकती थी, अगर पड़ोसी सजग न होते।
देहरादून, 28 जुलाई 2025 —
गृहप्रवेश का शुभ दिन। घर में ढोल बज रहा था, और किन्नर के वेश में कुछ लोग बधाई मांगने पहुंचे। लेकिन ये कोई आम बधाई मांगने वाले नहीं थे—ये थे भेष बदलकर आए ठग, जो लोगों की भावनाओं और परंपराओं को अपना हथियार बना चुके थे।
⚡ ‘ऑपरेशन कालनेमि’ में फंसा नकली किन्नर गैंग!
देहरादून की सांई लोक कॉलोनी, शिमला बायपास रोड पर अचानक सनसनी फैल गई जब मोहल्ले के सजग नागरिकों को इन “किन्नरों” की हरकतों पर शक हुआ।
पुलिस को तत्काल सूचित किया गया और पटेलनगर कोतवाली के अंतर्गत नया गांव चौकी की टीम मौके पर पहुंची।
🥁 ढोल वाले को पकड़ा, बाकी हुए फरार
जब तक पुलिस पहुँची, तीन “किन्नर के भेष में” आए लोग फरार हो चुके थे। लेकिन एक व्यक्ति, जो ढोल लेकर उनके साथ था, पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पूछताछ में उसने खुद को यासीन पुत्र रोशन अली (उम्र 32 वर्ष), निवासी सहारनपुर, यूपी बताया।
🧩 पूरे प्लान का पर्दाफाश
यासीन ने बताया कि वह अपने तीन साथियों के साथ—जिनमें दो ने किन्नर का भेष बना रखा था—गृहप्रवेश के मौके पर पैसे ऐंठने पहुंचे थे। उनका मकसद था लोगों की परंपराओं का फायदा उठाकर ठगी करना।
“लोगों की आस्था को अपना हथियार बनाना सबसे बड़ा अपराध है” — एक स्थानीय बुजुर्ग का आक्रोशित बयान।
🎯 निशाने पर थे नए मकान, भोले लोग
इस गिरोह का तरीका बेहद शातिर था—वे खासकर नवनिर्मित घरों को चुनते थे, जहाँ गृहप्रवेश की रस्मों के नाम पर वे किन्नर के भेष में आसानी से प्रवेश पा जाते। फिर चालाकी से पैसे मांगते, डराते और भावनात्मक दबाव बनाते।
🔍 समुदाय विशेष से जुड़ा है आरोपी, जांच जारी
पुलिस के मुताबिक यासीन और उसके तीन फरार साथी एक विशेष समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अब पुलिस इस पूरे गिरोह की पृष्ठभूमि और नेटवर्क की गहराई से जांच में जुटी है।
⛔ भावनाएं नहीं, सतर्कता ज़रूरी है!
आज के दौर में परंपराओं और आस्थाओं का सहारा लेकर ठग नए रूपों में सामने आ रहे हैं। ये सिर्फ अपराध नहीं, समाज की विश्वास प्रणाली पर हमला है।
“परंपरा की आड़ में अगर अपराध पनपने लगे, तो जागरूक समाज ही उसकी सबसे बड़ी रोकथाम है।”
🔴 अगली बार जब कोई बधाई मांगने आए—सिर्फ पैसा नहीं, पहचान भी पूछिए!
सावधान रहें, सतर्क रहें। ये दौर है आंख मूंदने का नहीं, आंख खोलने का।
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