कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर देश के लोग धूमधाम से अपने आराध्य के जन्मोत्सव और पुजा अर्चना मे व्यस्त है वही उत्तराखंड के चमोली जिले की चीन सीमा से लगे बार्डर पर अंतिम गाव मे सीमा पर युद्ध हालातो के बावजूद रोंगपा धार्मिक सांस्कृतिक पर्व शिव उत्सव मे व्यस्त है |
तिब्बत के पठारो से कभी व्यापार के लिए मशहूर ये भोटिया जनजाति के लोग आज भी अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए उतने ही मजबूती से खड़े है | दो जून की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत करने वाले भोटिया समुदाय के लोग अपने त्योहारो को भी पूरा महत्व देते है
एक तरफ जहाँ लद्दाख घाटी की सरहदों में चीनी ड्रेगंन की हरकतों से बॉर्डर पर माहौल गर्म ही तो वही उत्तराखंड के चमोली जिले से सटी भारत तिब्बत सीमा पर स्थित देश के अंतिम सरहदी ऋतु प्रवासी गाँवों नीति घाटी में अमन चैन का माहौल बना हुआ है,वर्ष 1962के इंडो चाईना वार में बड़ी भूमिका निभाने वाले ये भोटिया जनजाति के गाँव के निर्भीक ऋतु प्रवासी ग्रामीण आज भी अपनी विषम परिस्थिति में इन पठारी धुरों में रह कर अपनी परम्पराओं और रीति रिवाजों के लिए खासे जाने जाते है,
6दशकों से ये ग्रामीण भारत की द्वितीय रक्षा पंक्ति के खास योध्दा माने जाते है,करीब 6 माह इन तिब्बती पठारो में कड़ी मेहनत से हरियाली उगा कर अपनी आजीविका चलाने वाले ये भोटिया जन जाती के लोग अपने फ़ुर्सत के लम्हों और मनोरंजन के वक़्त को कुछ इस तरह से गुजारते है,यहाँ नीति घाटी में करीब एक माह से चल रहे रोंगपा धार्मिक सांस्कृतिक पर्व शिव उत्सव का समापन हो गया है आप इन तस्वीरों के माध्यम से खुद अंदाज लगा सकते की तिब्बत बॉर्डर से सटी इस नीति घाटी की भोटिया संस्कृति विरासत कितनी मजबूत होगी,अपने पारम्परिक भोटिया लोक गीतों की थाप पर किस तरह से तिब्बत बॉर्डर के ये लोग एकता का संदेश दे रहे है,इसी एकता को देख ड्रेगंन भी सोचने पर मजबूर है,घाटी के लोग इसी तरह से एकता और सामुदायिक रूप से सभी मेलों त्योहारो पर्वो को मिल जुल कर मनाते है,
