कारगिल युद्ध के दौरान 23 वर्ष की आयु में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया सतीश , 82 वर्षीय पिता ऑफिसो के चक्कर काटने को मजबूर।

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कारगिल शहीद सतीश को क्यों भूल गई : सरकार

बुजुर्ग पिता शहीद बेटे सतीश को सम्मान दिलाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
जिस भारत माता की आन, बान, शान के लिए अपनी जान की बाजी लगा गए सतीश उसी शहीद को भूल गई सरकार

थराली । सीमांत जनपद चमोली के विकासखंड नारायणबगड़ के दूरस्थ क्षेत्र सिमली गांव निवासी कारगिल शहीद सतीश के पिता 20 वर्षों बाद भी बेटे को सम्मान दिलाने के लिये सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। ऐसे में देश पर शहीद होने वाले जवानों को लेकर शासन और प्रशासन की संजीदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

गिरीश चंदोला थराली चमोली

नारायणबगड़ ब्लॉक के सिमली गांव में पांच अप्रैल 1976 को महेशानंद सती के घर शहीद सतीश चंद्र सती का जन्म हुआ। देश रक्षा के जज्बे के चलते भारतीय सेना में भर्ती हुआ। जिसके बाद कारगिल युद्ध के दौरान 30 जून 1999 को 23 वर्ष की आयु में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। सतीश की शहाद के बाद सरकार ने जहां शहीद के गांव को जोड़ने वाली नारायणबगड़-परखाल सड़क और प्राथमिक विद्यालय का नाम शहीद के नाम से रखने की घोषणा की। वहीं शहीद के नाम का स्मारक बनाने की घोषणा की गई। लेकिन शासन और प्रशासन की लापरवाही का आलम यह है. कि सीएम की घोषण के बाद सड़क पर शहीद के नाम का बोर्ड लगाया गया। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में वर्तमान तक सड़क का नाम नहीं बदला जा सका है। वहीं शहीद के स्मारक निर्माण के लिये गांव के जखोली सिमार में शिलान्यास के बाद कोई निर्माण नहीं हो सका है।

शासन और प्रशासन की इस लचर कार्रवाई के लिये सतीश के 82 वर्षीय पिता आज भी सरकारी घोषणाओं को जमीन पर उतराने के लिये दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

क्या कहते है शहीद के पिता

सतीश के शहीद होने के बाद सरकार की ओर से सड़क और विद्यालय का नाम सतीश के नाम पर रखने और स्मारक निर्माण की बात कही थी। लेकिन शासन और प्रशासन से पत्राचार के बाद भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।

महेशानंद सती , शहीद सतीश के पिता

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