पीएम मोदी के लोकल वोकल के सिद्धांत को पूरा करने में आड़े आ रहे जंगली सुंवरो को रोकने के लिए वन विभाग को गाँव मे सुंवर रोधी दीवार निर्माण के लिए प्रवासी उत्तराखंडी द्वारा बार बार लिखने के बाद स्वीकृत 5 लाख रु की बंदरबांट का आरोप लगने लगे है, आरोप है कि वन विभाग में जिस कार्य पर दो लाख दो सौ रु खर्च हुए उसे 5 लाख के आसपास समेट दिया, सीएम पोर्टल पर शिकायत के बाद शिकायत कर्ता पर ही सवाल खड़े कर दिए गए है। मामला टिहरी के जिले के भिलंगना रेंज के अंतर्गत हरियाणा गांव मल्ला के सुकताला नामे तोक में सूअर रोधी दीवार निर्माण का है जहां पुरानी दीवार पर सीमेंट पोत कर बजट को ठिकाने लगाने के आरोप लग रहे हैं शिकायत होने के बाद आपसी मिलीभगत से मामले को ठंडे करने का प्रयास किया जा रहा है। गाँव के विनीत कुमार ने बताया कि लोक डाउन के बाद गाँव लौटे प्रवासियों को ऐसे दर्जनों मामले दिखे है, बाकी समय मे गाँव मे पलायन के बाद शेष बचे ग्रमीणो को यू ही डरा धमका कर शांत कराया जाता है।
क्या इसी कानून की बदौलत किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य पूरा होगा?
प्रवासी लोकेंद्र राणा की रिपोर्ट।


कोरोना महामारी के दौरान वापस उत्तराखंड लौट रहे प्रवासी उत्तराखंड यों के लिए अपने घर गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उत्तराखंड सरकार की कई योजनाएं संचालित हो रही हैं सरकार की मंशा है की लोग अपने गांव में ही आजीविका उपार्जन करें और कम से कम लोग गांव से पलायन करें किंतु धरातल पर इसका योजना कितनी कामयाब हो रही है इसका उदाहरण वन विभाग के लमगांव रेंज और भिलंगना रेंज में हुए निर्माण कार्य को देखकर लगाया जा सकता है। स्थानीय ग्रामीण त्रिलोक सिंह राणा जो मुंबई में जॉब करते हैं तथा वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका में रह रहे हैं ने गांव की समस्या गांव में सूअर की समस्या को देखते हुए वन विभाग को गांव में सूअर रोधी दीवार बनाने के लिए प्रार्थना पत्र लिखा लेकिन कोई असर नहीं दिखाई दिया जिसके बाद उन्होंने सीएम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद गांव में सूअर रोधी दीवार निर्माण के लिए ₹500000 स्वीकृत किए गए किंतु वन विभाग ने 150 मीटर दीवार निर्माण पर ₹200000 खर्च के बाद बाकी के ₹300000 रोक दिए संबंधित टिहरी डीएफओ द्वारा ग्रामीणों के आवेदन पर कार्यवाही नहीं किए जाने से लोग परेशान हैरान हैं कि आखिर हर अलग-अलग गांव में 150 मीटर दीवार का निर्माण ₹200000 में कैसे हो सकता है जबकि इसके लिए ₹500000 स्वीकृत किए गए हैं खुद त्रिलोक सिंह राणा कहते हैं।
ग्राम सिलोड़ा और गरवाण गाँव के लिए सुवर रोधी दीवार की मंजूरी मिली थी। लेकिन ये कैसे संभव है कि हर गाँव में 5 लाख रुपयों से सिर्फ 150 मीटर ही दीवार बन सकती है।
इसलिए उन दोनों दीवार बनवाने के बारे में जानकारी चाहिए थी।

इसमें भिलंगना वाला गाँव हमारा है जहाँ खुद वहाँ के कृषकों ने ही दीवार बनाई तथा मटीरियल व मजदूरी सब कुछ मिलाकर कुल 2 लाख 2 सौ ही खर्च हुए। पुरानी दीवार जो पहले टूटी-फूटी थी उसको तोड़कर मजबूत बनाया और जहाँ दीवार पहले से ही मजबूत थी वहाँ उसपर बजरी सीमेंट भरकर उसे और मजबूत किया। उन्होंने सोचा कि 5 लाख मंजूर हुए हैं तो दीवार जितनी लंबी बन सके अच्छी बनायेंगे। लेकिन वनविभाग वालों ने 150 मीटर तक ही बनाने को कहा। जबकि 3 लाख तक शेष थे।

जंगली जानवरों द्वारा खेती को हो रहे नुकसान को बचाने के लिए मैंने ढाई सालों से 4-5 शिकायतें लगातार दर्ज करवाई हैं cm helpline पोर्टल पर। तब जाकर मुश्किल से इस दीवार की मंजूरी मिली थी। और अब देखते हैं कि उसमें भी घपलेबाजी हो रही है।
पहले DFO आफिस टिहरी को निवेदन किया कि बचे हुए पैसों से आगे दीवार बनवाने की कृपा करें, पर जब 10 दिनों तक भी उनका जवाब नहीं आया तो वन संरक्षक महोदय को शिकायत भेजी। उन्होंने जाँच करवाई DFO से ही जिन्होंने मेरे निवेदन का जवाब नहीं दिया था तो जाहिर है वे लीपा पोती ही करते।

उन्होंने ऐसे दो ठेकेदारों से हस्ताक्षर युक्त पत्र बनाया जिसमें लिखा गया कि ठेकेदारों ने ही दीवार बनाई और 2 लाख मजदूरी व टैक्स काटकर बाकी के पैसों से बजरी, रोड़ी, पत्थर, सीमेंट व बाकी का सामान लगा। जबकि उन ठेकेदारों का उस निर्माण कार्य से कोई लेना देना नहीं था। ना ही वे और ना ही उनका कोई आदमी कभी निर्माण स्थल पर कभी दिखाई दिया।
त्रिलोक सिंह आगे कहते है
दीवार निर्माण कार्य में खुद सुकताल वाले शामिल थे इसलिए उन्होंने दीवार पूरी ईमानदारी और मेहनत से अच्छी मजबूत बनायी और कुल खर्चा भी ईमानदारी से वही दिखाया जो हुआ था मतलब 2 लाख, 2 सौ।
कयोंकि वो दीवार बहुत पुरानी और टूटी फूटी थी, जिससे जंगली जानवर खेतों में घुस कर फसलों को बर्बाद कर देते थे, इसलिए उसी दीवार को मजबूत बनाया गया। दीवार निर्माण कार्य में कोई खराबी नहीं है। खराबी है तो ये कि जब स्थानीय कृषकों ने 2 लाख में सीमेंट, रेती, रोड़ी, कुछ पत्थर, हथियारों की मरम्मत और पूरी मजदूरी पकड़ कर हिसाब दिखाया जंगलात विभाग को तो बाकी के बचे हुए पैसों के आगे और 100 मीटर के लगभग दीवार बन सकती थी।
इति प्रथम अध्याय समाप्तम
