नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करने का सबसे उपयुक्त मार्ग है ‘मौन साधना’ः स्वामी चिदानन्द

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ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें याद करते हुये कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक श्रेष्ठ चिन्तक और संगठनकर्ता थे जिन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को वर्तमान परिपेक्ष्य के अनुसार प्रस्तुत कर  ‘एकात्म मानववाद’ विचारधारा से सभी को अवगत कराया। उन्होंने भारत को सशक्त, समृद्ध और विकसित करने के लिये हमेशा समावेशित विचारधारा का समर्थन किया। आज उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि और उनकी देशभक्ति को शत-शत नमन।
आज माघ माह की अमावस्या अर्थात मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर देशवासियों को शुभकामनायें देते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गंगा जी और पवित्र नदियों में श्रद्धापूर्वक स्नान कर नदियों और जलस्रोतों को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प लें। मौनी अमावस्या हमें ‘‘मौन’’ रूपी जीवन का स्वर्णिम सूत्र देती है। मौन, आंतरिक गहराई और शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करने का सबसे उपयुक्त मार्ग है मौन साधना।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का पूरा चिंतन और जीवन ही राष्ट्र को समर्पित था व राष्ट्र की उन्नति और समृद्धि के लिये था। उनका दर्शन जिसे ‘एकात्म मानववाद’ कहा जाता है उसका उद्देश्य एक ऐसा ‘स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल’ स्थापित करना है जिसके विकास का केंद्र मानव हो। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने मानव के संपूर्ण विकास के लिये भौतिक विकास के साथ आत्मिक विकास पर भी बल दिया। साथ ही, उन्होंने एक वर्गहीन, जातिहीन और संघर्ष मुक्त सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की थी। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को मुख्य धारा में लाने के लिये यह चिंतन आज भी अत्यंत उपयुक्त और प्रासंगिक है। स्वामी जी ने कहा कि आज विश्व की एक बड़ी आबादी गरीबी में जीवन यापन करने को मजबूर है इसलिये दुनिया को एक ऐसे मॉडल की जरूरत है जो हर हाथ को रोजगार, आत्मनिर्भरता और प्रत्येक मनुष्य को गरिमापूर्ण जीवन दे सके। भारत के ऊर्जावान प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी ने जो आत्मनिर्भर भारत का संदेश दिया है वह तभी सम्भव हो सकता है जब हम सभी की सहभागिता हो। हमें अपने गांवों को आत्मनिर्भर बनाना होगा तथा हम सभी को लोकल के लिये वोकल होना होगा।

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