हरिद्वार निगम खरीदी घोटाले की आग अभी ठंडी नहीं पड़ी है. दो वरिष्ट IAS अफसरों का भविष्य अब एक ही सवाल पर टिका है: निलंबन बढ़ेगा या बहाली की सिफारिश होगी? रिव्यू कमेटी की बैठक इसी नए साल के शुरू में तय करेगी कि किस दिशा में आगे का रास्ता?
मुख्य बात क्या है?
- हरिद्वार नगर निगम में लगभग 35 बीघा जमीन जैसी बड़ी खरीदारी के alleging घोटाले के बाद इन अफसरों पर गाज गिरी थी.
- निलंबन की अवधि बढ़ाने या बहाली की सिफारिश करने के लिए रिव्यू कमेटी, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव आनंद वर्धन कर रहे हैं, अब निर्णय करेगी.
- मुख्यमंत्री के समक्ष समिति की रिपोर्ट रखी जाएगी और उसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा.
कौन हैं वे अधिकारी?
- कर्मेंद्र सिंह, हरिद्वार जनपद के जिलाधिकारी, और वरुण चौधरी, नगर आयुक्त — दोनों IAS अफसर. छह महीने के भीतर निलंबन की शर्तों पर खरे उतरते रहे, पर मामला अब सुलगता जा रहा है.
- सेकंड-लाइन में कई अन्य अधिकारी भी निलंबन की चपेट में आए थे; इस घोटाले के रंग अभी धूमिल नहीं हुए.
घटना : एक नज़र में घटनाक्रम
- जमीन खरीद में बड़ा कथित घोटाला सामने आया; 50 करोड़ से अधिक के लेन-देन पर सवाल उठे.
- केंद्र-विधान के जटिल नियमों के कारण निलंबन का शासन-चक्र आगे बढ़ रहा है: एक महीने, फिर सहमति के बाद दो महीने, फिर छह महीने या एक साल—और फिर केंद्र की हरकतें.
- सचिन कुर्वे की जांच रिपोर्ट सरकार के हाथ में है; अब रिव्यू कमेटी विचार-विमर्श करगी कि आग कितनी तेज होनी चाहिए.
सूत्रों के मुताबिक क्या उम्मीद?
- निलंबन की अवधि बढ़ाने की सिफारिश कमेटी दे दे, तो सरकार को कड़ा निर्णय लेना होगा. लेकिन अगर बहाली की राह खुली, तो भविष्य में शायद उनके योगदान पर सवाल और भी अधिक उभरेंगे.
- मुख्यमंत्री अंतिम निर्णय लेंगे, जिसने कई बार राजनीतिक दबाव के बीच कड़ा संतुलन दिखाया है.
स्थानीय रंग और भावनाएं
- हरिद्वार के स्थानीय लोग बताते हैं कि “घोटाले की रिपोर्ट ने पुलिस-प्रशासन के भरोसे को हिला दिया.” लोग सोचते हैं कि शिक्षा-स्वास्थ्य के साथ-साथ सत्ता में भी जवाबदेही जरूरी है.
- कार्यालयों के बाहर कठोर चुप्पी और भीतर की गर्मी—जिनमें उम्मीद की किरण भी है कि सच्चाई जल्दी बाहर आएगी.
क्या यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का हथियार है या प्रशासनिक तंत्र की परीक्षा?
- यह एक बड़ा परीक्षा-क्षेत्र है: कितना असरदार है रिव्यू कमेटी की निगरानी, कितनी जल्दी और साफगोई से तथ्य सामने आते हैं.
- अगर प्रशासन ने सच में सुधार की दिशा पकड़ी, तो यह संदेश होगा कि निलंबन-झटकों के बावजूद देश की जनता को जवाबदेही मिल रही है.
समाप्ति: एक सवाल जो हर दिल के करीब है
क्या सही फैसले से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत संकेत मिलता है, या फिर यह फैसला केवल समय खींचने वाला खेल बनकर रह जाएगा? समय बताएगा, पर अटल सच यही है—उत्तराखंड की ग़ैर-सरकारी आवाजें भी कहती हैं: जवाबदेही अभी शुरू ही हुई है.
