उत्तरकाशी
राज्य निर्माण से पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड प्रदेश में सरकार बनाने का मिथक को अभी तक बनाये रखने वाली गंगोत्री इस बार विधयक गोपाल के असमय चले जाने से खुद को जहा अनाथ महसूस कर रही है, वही इस पीड़ा के गर्भ से कुछ नए सुरों का संचार धीमे श्वरो में सुनाई देने लगा है | राजधानी देहरादून के राजनैतिक पंडितो के गणित के आधार पर इस बार गंगोत्री सिर्फ सरकार बनाने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि सीएम बनाने का भी हुनर पाल सकती है |
दरअसल प्रदेश में अचानक हुए सत्ता में मुखिया परिवर्तन के बाद पौड़ी सांसद तीरथ सिंह रावत को त्रिवेन्द्र रावत की गद्दी सौंप दी गयी, संविधान के अनुसार इन्हें 6 महीने के भीतर विधानसभा सदस्य चुनकर आना है| मुख्यमंत्री किस विधानसभा से चुनाव लड़ेंगे ये सवाल अभी तक राजनैतिक दलों के लिए पहेली बना हुआ था किन्तु गंगोत्री विधान सभा सीट रिक्त होने के बाद इसका जबाब आसान हो गया है | इस सीट पर भी उपचुनाव होने ही है | प्रदेश सरकार यदि मध्यावधि चुनाव में नहीं जाना चाहती है तो सीएम को भी किसी न किसी सीट से विधायक चुनकर आना है और गंगोत्री की रिक्त सीट पर भी उपचुनाव तय है, ऐसे में बजाय किसी से इस्तीफ़ा देकर सीट खाली कराने से बेहतर विकल्प बीजेपी के लिए यही हो सकता है कि सीएम तीरथ सिंह रावत उत्तरकाशी कि गंगोत्री विधानसभा से उपचुनाव लडे | इससे गंगोत्री के सरकार बनाने के मिथक के साथ सीएम कि दावेदारी और पुष्ट हो सकती हैं | सीएम तीरथ सिंह के पास गंगोत्री के अलावा पौड़ी कि ऋतू खंडूरी की विधानसभा यमकेश्वर अथवा सतपाल महाराज की चौबट्टा खाल विधानसभा शूट करती है पर इसके एवज में दोनों नेताओ के सांसद का टिकट बदले में दिए जाने कि शर्त रखी जा सकती है |
त्रिवेन्द्र रावत ने 9 मार्च को इस्तीफ़ा दिया था जबकि १० मार्च को तीरथ सिंह रावत ने मुखिया के तौर पर पद भार ग्रहण किया था इस लिहाज से 10 सितम्बर तक 6 महीने का कार्यकाल पूरा हो जायेगा जबकि नयी सरकार बनाने के लिए मार्च का समय प्रदेश सरकार के पास है | सूत्र बताते है कि प बंगाल में चुनाव की स्थिति का उत्तराखंड में सीधा असर देखने को मिल सकता है | अगर बंगाल में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हुई तो उत्तराखंड में बीजेपी मधय्वाधि चुनाव में जाने का ऐलान कर सकती है इससे मुख्यमंत्री को उप चुनाव में नहीं जाना पड़ेगा और सभी सीटो पर एक साथ चुनाव हो सकेगा , वही यदि स्थिति भिन्न हुई तो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी , ऐसी स्थिति में गंगोत्री में भी उपचुनाव होंगे और सीएम को विधायक बनना जरुरी होगा |
गंगोत्री सीट पर स्व विधायक गोपाल रावत के परिवार को टिकट देने का दूसरा विकल्प पार्टी के पास होगा, इस पर भी सल्ट विधानसभा उप चुनाव के परिणाम की छाया पड़नी तय है | बीजेपी ने सल्ट में स्व विधायक के भाई को टिकट दिया है अगर जीत का अन्तर अच्छा हुआ तो गंगोत्री में इस विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है | गंगोत्री में स्व विधायक की पत्नी को पार्टी की तरफ से उमीदवार बनाया जा सकता है , इस परिक्षi में खरा उतरने के लिए स्व विधायक गोपाल रावत की पत्नी शांति रावत को अब तक की किचन कैबनेट और पार्टी संगठन के साथ तालमेल बैठाते हुए अपने नेतृत्व क्षमता का परिचय देना होगा | स्व० विधायक के असमय चले जाने के बाद पैदा हुई सहनुभूति को चुनाव के दौरान लहर में बदलने से रोकने के लिए तत्पर भीतर बैठे लोगो पर भी नजर रखनी होगी साथ ही अपने स्तर पर फैसले न लेने की दशा में किचन में पैदा हो रही गुटबाजी को बाहर से नाराज चल रहे शरारती तत्वा अपना बैक डोर समर्थन दे सकते है |
गंगोत्री से तीसरा एंगल कर्नल अजय कोठियाल खोल सकते है | हाल में ही आम आदमी के हो चुके अजय कोठियाल भले ही देश और दुनिया में केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण के बाद से चर्चा में आये हो किन्तु केदारनाथ धाम को जाने का मार्ग उत्तरकाशी की गंगोत्री विधान सभा के कारन ही प्रशस्त हुआ | कर्नल अजय कोठियाल उत्तरकाशी नेहरु पर्वतारोहण संस्थान में प्राचार्य के पद पर रहते हुए ही केदारनाथ कि तरफ बढे थे | कर्नल का खुद का घर गाव नरेन्द्र नगर विधान सभा में पड़ता है लिहाजा गंगोत्री , केदारनाथ और नरेन्द्र नगर में से किसी एक विधान सभा से कर्नल अपनी किस्मत आजमाएंगे | जिसमे से गंगोत्री सबसे ज्यादा मुफीद है जबकि केदारनाथ में काम करने के दौरान ही उनके राजनीती में आने की सुगबुगाहट के बीच उनके कई राजनैतिक दुस्मन भी पैदा हो गए थे जो इस बार चुनवा लड़ने पर फिर से उनकी जन्म पत्री तैयार करके बैठे होंगे | कर्नल कोठियाल अपने आप में बहुत ही अच्छे इन्सान और समाज सेवक है किन्तु टीम में राजनीतिक अनुभव की कमी के चलते वर्ष 2018 -19 में राजनीती में मिस फायर होना बताता है कि यूथ फाउंडेशन देश के लिए मर मिटने वाले सैनिक तो तैयर कर सकता है किन्तु राजनैतिक समीकरण की परख के लिए उन्हें अपनी टीम में कुछ बदलाव करने होंगे | गौरतलब है कि पिछले लोक सभा चुनाव में कर्नल अजय कोठियाल के लिए कभी कांग्रेस में तो कभी बीजेपी में सामिल होने कि अफवाए उड़ाई गयी | आरएसएस के मोहन भगवत से निकट सम्बन्ध होने का हावाला दिया गया पर ऐन मौके पर फायर मिस हो गया | सेना में प्रमोसन छोड़कर वीआरएस लेने आर्मी अफसर खुद समझते है कि एक मिस फायर का क्या मतलब होता है और इसकी भरपाई के लिए कब क्या करना होता है | बीजेपी कांग्रेस से गच्चा खाने के बाद कर्नल अजय कोठियाल पर आम आदमी पार्टी की नजर पड़ी तो उन्हें सीएम का कैंडीडेट बताकर पार्टी में सामिल कर लिया | आम आदमी पार्टी और दिल्ली के केजरीवाल का व्यवहार उत्तराखंड के पहाड़ी लोगो के अनुकूल बिल्कुल माफिक नहीं होने के कारन कर्नल अजय कोठियाल को उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी का केजरीवाल चेहर से हटकर नहीं छवि तैयार करनी होगी जिसमे समय लगाना तय है |
वही अब तक गोपाल और विजयपाल दो दोस्तों की गंगोत्री में पहली बार तीसरा कोण बनने से कांग्रेस भी सकते में है | कांग्रेसी नेता विजयपाल सजवान के बीजेपी में सामिल होने को लेकर भी कई दौर कि अफवाह उडी किन्तु ये खुद विजयपाल भी समझते है कि प्रदेश की बीजेपी में सामिल होने का मतलब सिर्फ विधायक बनना है जबकि कांग्रेस की सरकार बनने पर उन्हें मंत्री पद से सुसोभित किया जा सकता है, प्रदेश में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार गिराते समय बीजेपी में सामिल होने का इतना बड़ा मौका छोड़ने वाले विजयपाल सजवान इसके लिए जल्दबाजी में कोई भी निर्णय लेने को तैयार नहीं है , हालाँकि ये तय था कि बीजेपी में सामिल होने पर पार्टी अपने वादे के मुताबिक गंगोत्री से उन्हें ही टिकट देती और आज तस्वीर कुछ और होती , लिहाजा कसमसाहट हर जगह है | अब तक हर चुनाव में एक दुसरे की तरफ गेंद पास करते रह गोपाल और विजय पाल की गंगोत्री में इस बार जरा सी चूक से पेनाल्टी कार्नर झेलना पड़ सकता है |
