टीबी के खिलाफ जंग का ऐलान! देहरादून में 20 मरीजों को ‘गोद’ लेकर स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय की बड़ी पहल

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विश्व क्षय रोग दिवस पर जागरूकता से आगे बढ़कर जिम्मेदारी—छात्रों के नुक्कड़ नाटक ने झकझोरा समाज


देहरादून से एक उम्मीद भरी खबर…
जहाँ एक ओर टीबी जैसी गंभीर बीमारी आज भी समाज में डर और भेदभाव का कारण बनी हुई है, वहीं डोईवाला में एक ऐसी पहल सामने आई है जिसने सिर्फ जागरूकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का उदाहरण पेश किया है।

स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय और हिमालयीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज ने विश्व क्षय रोग दिवस पर एक ऐसा कदम उठाया, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया।


🎭 नुक्कड़ नाटक ने खोली आंखें

कार्यक्रम के दौरान बीएएमएस छात्रों ने जब नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया, तो माहौल एकदम बदल गया।
टीबी के लक्षण, बचाव और इलाज को जिस अंदाज में दिखाया गया—वह सीधे दिल को छू गया।

👉 “समय पर इलाज ही बचाव है”
👉 “डर नहीं, समझ जरूरी है”

ये संदेश सिर्फ संवाद नहीं थे—ये समाज के लिए चेतावनी थे।


💪 20 मरीजों की जिम्मेदारी—सिर्फ इलाज नहीं, पूरा साथ

सबसे बड़ी और भावुक पहल रही—20 टीबी मरीजों को 6 महीने के लिए ‘गोद लेना’

काय चिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. रवि जोशी ने बताया—

“इन मरीजों को सिर्फ दवा ही नहीं, बल्कि उच्च प्रोटीनयुक्त आहार और नियमित देखभाल भी दी जा रही है।”

यह पहल दिखाती है कि इलाज सिर्फ अस्पताल में नहीं, बल्कि समाज के सहयोग से पूरा होता है।


🩺 “जागरूकता ही असली हथियार है”

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए प्राचार्य डॉ. नीरज श्रीवास्तव ने साफ कहा—

“टीबी को खत्म करना है तो सबसे पहले लोगों के मन से डर और भ्रम हटाना होगा।”

उनकी बातों में सच्चाई भी थी और एक चेतावनी भी—
जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, बीमारी खत्म नहीं होगी।


🚑 नर्सिंग छात्रों की जमीनी जंग

हिमालयन कॉलेज ऑफ नर्सिंग की टीम सिर्फ बातों तक सीमित नहीं है।
छात्र गाँव-गाँव जाकर मरीजों से मिल रहे हैं, उन्हें दवा लेने, सही खान-पान और मानसिक मजबूती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

प्राचार्या डॉ. अंजना विलियम्स ने बताया—

“हम सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि मरीजों को सामाजिक भेदभाव और अवसाद से भी बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं।”


🌄 बदल रही है तस्वीर

लगातार प्रयासों का असर अब दिखने लगा है।
जागरूकता बढ़ रही है…
और धीरे-धीरे टीबी के मामलों में कमी भी देखी जा रही है।


💥 अंत में एक सवाल…

क्या हम भी अपने आसपास किसी टीबी मरीज का साथ देने के लिए तैयार हैं?
या फिर आज भी डर और दूरी ही हमारी पहचान है?

यह पहल सिर्फ 20 मरीजों की नहीं… बल्कि एक सोच की है—जो कहती है, “बीमारी से लड़ो, मरीज से नहीं।”

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