भले ही देश 21 वी सताब्दी में जी रहा हो किन्तु उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी गाँव मे लोग आज भी 18वी सदी में जीने को मजबूर है।पहाड़ की चोटी पर सड़क से कई किमी दूर बसे इन गाँवो में अस्पताल की सुविधा नही है हैरानी की बात है कि बीमार होने पर लोग डॉक्टर नही देवता के पास जाते है।उत्तरकाशी जनपद के पुरोला विकासखंड से जुड़े सुदूर सर बडियार पट्टी के 8 गाँव मे लोग आज भी आधार भूत सुविधाओ के बगैर जी रहे है। विकास खंड पुरोला से 30 किमी सड़क दूरी के बाद कई किमी की खड़ी चढ़ाई पार करने के बाद गाँव मे पहुचा जाता है। राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा जब पहली बार पैदल मार्ग से सर बडियार के इलाके में पहुचे तो मीडिया के माध्यम से देश और दुनिया के लोगो ने भी इस नई दुनिया के बारे में जाना।वर्षो से सड़क की मांग कर रहे ग्रामीणों को जब सड़क नही मिली तो उन्होंने लोक सभा चुनाव 2019 के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी , जिसके बाद उत्तरकाशी डीएम डॉ आशीष चौहान ने पैदल गाँव की दूरी नाप कर गाँव मे बहुउद्देशीय शिविर लगाकर सभी जिला स्तरीय अधिकारियों को भी गाँव तक पहुँचाया। गाँव मे आईएएस के साथ जिला स्तरीय अधिकारियों का रेला निकला जो अपने आप मे ग्रामीणों के लिये ऐतिहासिक घटना थी। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गंगरली पुल से आगे की सड़क पर 32.44 लाख मरम्मत पर खर्च होने के बाद भी सड़क पर काम नही हुआ लिहाजा कोई वाहन इस पर नही दौड़ रहा था। डीएम का दौरा हुआ तो लोक निर्माण विभाग वर्ड बैंक भी सतर्क होकर हारकत में आया और आनन फानन में सड़क पर जेसीबी दौड़ाकर उसे ठीक ठाक कर लिया गया।डीएम के इस दौरे को ग्रामीण किसी देवता के आगमन से कम नहीं मानते। भला क्यों न हो , उस दिन के बाद से अब इस सड़क पर टैक्सी और निजी वाहन भी इस अधूरे सड़क मार्ग पर दौड़ने लगे तो गाँव तक की कुछ तो दूरी कम हुई।

गाँव के पैदल मार्ग प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है , किन्तु मानसून के 4 महीने ग्रामीणों के लिए किसी आफत से कम नही है। गाँव के पैदल रास्ते से लगी बडियार नदी जब वर्षा के बाद प्रचंड रूप लेती है तो आवाजाही के संपर्क पुलों के साथ बटिया को भी बहा ले जाती है। बरसात में कई सूखे खड्ड भी उफान पर होते है और आवाजाही मुश्किल हो जाती है। खासकर स्कूल आने जाने वाले और बीमार अथवा प्रसूता महिलाओं की तो जान पर ही बन जाती है। अस्पताल के नाम पर गाँव मे एक आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी है जिसमे डॉक्टर तो कभी आया ही नही किन्तु फार्मशिस्ट भी महीने के दो फिन हाजिरी लगाकर गायब हो जाते है। अस्पताल में केवल एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात रहता है ।
खुशी की बात ये है कि 70 वर्षो बाद पिछले वर्ष गाँव मे बिजली आ चुकी है। किंतु इसके लिए भी ग्रामीणों को लंबे समय तक पुरोला तहसील में धरना और भूख हड़ताल करनी पड़ी।

डिंगड़ी गाँव मे बेसिक और जूनियर हाई स्कूल है, जर्जर स्कूल का भवन किसी अस्तबल से भी बद्दतर स्थिति में है। छत की चद्दरें उखड़नें को है तो भवन की खिड़की ही गायब है, वही बरसात में पानी स्कूल के कमरों में भर जाता है तो मजबूरी में छुट्टी करनी पड़ती है।
डिंगड़ी गाँव मे पानी की किल्लत है, गाँव के ऊपर और नीचे प्राकृतिक जल स्रोत है किंतु ग्रामीणों को अपने पीने के लिए और पालतू जानवरों के लिए पानी पीठ पर ढोकर लाना पड़ता है। जल स्रोत पर पानी के लिए लंबी कतार लगती है और ग्रामीणों को बारी से पानी मिलता है। दिन का आधा समय तो पानी ढोने में ही बीत जाता है। वर्षो पूर्व जल संस्थान ने पानी के कनेक्शन भी दिए जिनमे वर्षो से पानी नही आया किन्तु विभाग ने इसकी सुध तक नही ली।
गाँव के ही कैलास रावत ने बताया कि संस्थान की लाइन से 6 महीने बाद पानी आना बंद हो गया था, किन्तु विभाग के इसकी सुध नही ली।
गाँव मे खेती उपजाऊ है उपज अच्छी होती है किंतु इसका फायदा काश्तकार को नही मिल पाता। पैदल दूरी के चलते खच्चरों का भाड़ा इतना अधिक हो जाता है कि किसान को उत्पाद की कीमत नही मिल पाती, रही सहीं कसर जंगली जानवर पूरी कर देते है।बाइट गाँव मे बड़ी तादाद में बुजुर्ग रहते है। गाँव मे पोस्ट ऑफिस अथवा बैंक नही होने से ग्रामीणों को कई किमी दूर पेंसन के लिए दौड़ना होता है जो किराए भाड़े में ही खर्च हो जाती है।
इतना ही नही गाँव मे कोई मोबाइल टावर भी काम नही करता, जिसके चलते ग्रामीण देश दुनिया से कटे रहते है।यही वजह है कि बीमार होने पर दवा और डॉक्टर नही मिलने से लोग देवताओं के पास जाते है और देवता ही उनका इलाज करते है।जिसके चलते भूत प्रेत ,ऊपरी छाया, आदि अंधविश्वास में पड़कर कई बार लोग अपनी जान तक गंवा देते है।

