उदघाटन के बाद बिजली बंद- टूट गया गाँव मे टीवी देखने का सपना

Share Now

उद्घाटन के बाद ही बंद हो गयी उरेडा की चिलुड लघु जल विधुत परियोजना।

वैकल्पिक ऊर्जा विभाग की विकल्प की जरूरत

मोरी ब्लॉक के चार गाँव का टूटा सपना।

हरकीदून ट्रैक पर है चिलुड़ लघु जल विधुत परियोजना।

गिरीश गैरोला

प्रधानमंत्री मोदी के घर घर बिजली पहुचाने की मुहिम में विभाग कहाँ और कैसे पलीता लगाता है इसका उदाहरण उत्तरकाशी जिले की चिलुड गाड़ परियोजना को देखकर समझा जा सकता है।
उत्तरकाशी के मोरी ब्लॉक में हरकीदून मार्ग पर  उरेडा की मदद से चिलुड गाड़ लघु जल विधुत परियोजना का निर्माण 26 जुलाई 2008 में सुरु हुआ था जिसकी लागत 152 लाख रु रखी गयी थी। परियोजना में 50 किलोवाट की दो टरबाइन लगनी थी और 100 किलोवाट बिजली उत्पादन से आसपास के चार गांव ओसला ,गंगाड, पंवाणी और धारकोट को बिजली से जगमग होना था।  परियोजना के उद्घाटन के लिए डीएम उत्तरकाशी डॉ आशीष चौहान को मौके पर बुलाया गया गाँव मे बिजली आयी तो खुसी में  ग्रामीणों ने टीवी भी खरीद लिए । किन्तु उद्घाटन के बाद ही परियोजना बंद हो गयी बताया गया कि मानसून आने से पूर्व ही दैवी आपदा में  परियोजना का सोर्स टूट गया था।
बताते चले कि वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत को विकसित करने के लिए केंद्रीय सरकार पानी की उपलब्धता के आधार पर आईआईटी रुड़की के इंजीनियरो के सहयोग से इलाके में परियोजना के लोए सर्वे करती है और उरेडा की फिजिबल रिपोर्ट के आधार पर 90% बजट आवंटित करती है 10% धन श्रम के रूप में  स्थानीय ग्रामीण लोगो से लिया जाता है । सहभागिता के आधार पर समिति बनाकर परियोजना ग्रामीणों को हैंडओवर कर दी जाती है। उत्तरकाशी जिले में इस समय उरेडा द्वारा कुल 7 परियोजनाएं संचालित हो रही है जिनमे रुद्रगैरा गंगोत्री 3*50 किलोवाट, केदार गंगा गंगोत्री 1*20 किलोवाट, हर्सिल 2*100 , जानकी चट्टी 2*100 , इस्तर गाड़ 2*100,  खपुगाड 1*40, और चिलुड गाड़ 2*50 किलोवाट सामिल है।
पूरे प्रदेश में ही लघु जल विधुत पतियोजनाये उरेडा विभाग की अनुभवहीनता के चलते हांफ रही है। दरअसल परियोजना का सिविल वर्क सहित प्रोजेक्ट का संचालन ग्रामीणों की नॉन टेक्निकल समिति द्वारा किया जाता है और अक्सर यही कार्य सोर्स बहने के चलते प्रॉजेक्ट बंद हो जाता है। अभी तक जहाँ जहाँ प्रोजेक्ट को लीज पर निजी ठेजेदारो को दिया गया है वे बिजली उत्पादन वितरण पर अपना खर्चा उठाने के साथ रिपेयर का भी खर्च उठा रहे है।
हरकीदून ट्रैक पर चिलुड गाड़ परियोजना का टेंडर भी वर्ष 2013 में हो चुका था सिविल वर्क ग्रामीणों की समिति से कराने के बाद मशीन लगाने का काम स्टैण्डर्ड इलेक्ट्रॉनिक्स रुड़की को दिया गया जबकि पोल और लाइन बिछाने का काम शुभम को दिया गया। ठेकेदार काम अधूरा छोड़कर बीच मे ही चला गया, इस बीच प्रोजेक्ट की टरबाइन और पैनल तालुका में जिस घर मे रखी गयी थी उसने भी किराया नही मिलने से उन्हें बाहर खुले में रख दिया ।
वर्ष 2017 तक उक्त मशीन टरबाइन और पैनल  धूप और वर्षा झेलते झेलते खराब हो गयी।
वर्ष 2018 में फिर से  टेंडर हुआ इस बार मशीन संबंधित इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल कार्य महेश माइक्रो इलेक्ट्रिकल्स को सौंपा गया, 28 अप्रैल 2018 को आसपास के तीन चार गाँवो ने पहली बार अपने घर मे बिजली की रोशनी देखी। किन्तु इस बीच सोर्स और सिविल वर्क के टूटने से उद्घाटन के बाद ही बिजली उत्पादन बंद हो गया।
पूर्व प्रमुख मोरी और चिलुड परियोजना समिति के अध्यक्ष  बचन पंवार ने डीएम उत्तरकाशी से आपदा मद में उक्त मरम्मत के लिए धन की मांग की किन्तु डीएम ने बिना आपदा के और मानसून पूर्व इस मद से बजट देने से इनकार कर दिया।
उरेडा की अनुभवहीनता और फिजिबल रिपोर्ट की कमियां यही तक सीमित नही है । इसी हरकीदून ट्रैक पर खापु  गाड़ परियोजना में इसी तरह हिचकोले खा रही है। सोर्स पर पानी की कमी के चलते निर्धारित 40 किलोवाट के स्थान पर महज 15 से 20 किलोवाट ही बिजली बन पा रही है जो ग्रामीणों के लिए पर्याप्त नही है और प्रोजेक्ट ओवर लोड की समस्या से जूझ रहा है।
जानकारों की माने तो यदि खापु  गाड़ की टरबाइन कुछ नीचे स्थापित की जाती तो 100 मीटर की अतिरिक्त ऊंचाई बढ़ने से 50 किलोवाट तक बिजली बन सकती थी अथवा  बड़े टैंक निर्माण से अतिरिक्त पानी का जमाव कर भी बिजली उत्पादन का टारगेट प्राप्त किया जा सकता था।
दरअसल लघु जल विधुत परियोजना ही सही इसे संचालित करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम लोगो की जरूरत होती है, इलाके में ठेकेदारी से जुड़े अमीर परिवार पहले से ही  अपने बच्चों सहित सुविधाजनक स्थानों पर जा चुके है जो कभी कभार पिकनिक के तौर पर गाँव का रुख कर लेते है । यही वजह है कि उरेडा के वही प्रोजेक्ट अभी तक सफल है जिन्हें लीज पर दिया गया है।
गंगोत्री और इस्तर गाड़ की लघु जल विधुत पतियोजना इसका उदाहरण है।
error: Content is protected !!