सोनभद्र की जमीन गुंडों की जागीर नहीं, आदिवासियों की मातृभूमि है – आइसा
बेकसूर आदिवासियों के हत्यारों और सामंती भाजपा को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी- शैलेश पासवान
सभी जिम्मेदार अधिकारियों को कठोर सजा व भूमि सुधार कानून 2006 लागू हो – प्रदीप दीप
दिनांक 19 जुलाई 2019 प्रयागराज ।
सोनभद्र जिले के ग्राम पंचायत मुर्तिया के उम्भा गांव में 17 जुलाई को एक दबंग माफिया,अजगर मुखिया यज्ञदत्त ने अपने 200 गुंडों के साथ 10 गोंड आदिवासियों ( जिनमें तीन महिलाएं भी हैं ) की खुले आम गोली मारकर निर्मम हत्या कर दिया । इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए हुए आइसा छात्र ने त्वरित रूप से वहां के जिम्मेदार जिलाधिकारी, एस पी, एसएसपी व फोरेस्टर को निलंबित, सस्पेंड सहित व घटने में शामिल सभी 200 दबंग गुंडों समेत अधिकारियों की गिरफ्तारी और कड़ी सजा की मांग की है ।
अंकित तिवारी।
सोनभद्र में आदिवासियों की हत्या मध्ययुग की दो रियासतों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा नहीं है, बल्कि आज के "मजबूत" भारत की हक़ीक़त है । उप्र के सोनभद्र जिले में दिन दहाड़े आदिवासियों की जमीन पर जबरन कब्जा करने के लिए 10 बेकसूर आदिवासियों का नरसंहार कर दिया गया । पहले उनकी जमीन को एक नौकरशाह ने हड़पा और फिर उसे स्थानीय दबंगों को बेच भी दिया । अब उन दबंगों ने कब्जा करने के लिए बारिश के मौसम में गोलियों की बरसात कर 10 आदिवासियों की हत्या की और सैकड़ों को घायल किया । विडम्बना है कि जिस घटना पर राष्ट्रीय शर्म होना चाहिए उस पर कोई मामूली बहस भी नहीं है ।

आइसा के प्रदेश अध्यक्ष शैलेश पासवान ने इस नरसंहार की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ये कोई “जमीन विवाद में दो पक्षों में हिंसा ” जैसी चीज नही है बल्कि आदिवासियों की जमीन को हड़पने के लिए किया गया उनका नरसंहार है , और इस नरसंहार की कीमत उन दबंगों और सामंतवादी भाजपा सरकार को भारी पड़ेगी, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी । भूमि सुधार कानून 2006 जल्द से जल्द लागू किया जाए ।

सोनभद्र जिले से आने वाले आइसा के भूतपूर्व सहसचिव व हिंदी विषय मे दो बार जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके प्रदीप कोल ने बताया कि आदिवासियों को मिले 90 बीघा जमीन पर जबरन कब्जा करने आये दबंग मुखिया के लगभग 200 गुंडे जमीन को जब ट्रैक्टर से जोतने लगे तब आदिवासियों ने विरोध किया । लेकिन दबंग फायरिंग करते हुए गोलियां चलाने लगे और आधा दर्जन से भी ज्यादा बेकसूर, कमजोर व निहत्थे आदिवासियों की निर्मम हत्या कर दी । अफरा-तफरी के बीच जान बचाने के लिए लोग चीखते हुए भागने लगे । जो भागने में अक्षम थे उन्हें लाठी से पीटकर भीभत्स तरीके से उनकी हत्या की गई। दिल दहलाने वाली घटना से अगल-बगल गांवों में भय और सन्नाटा पसरा है। इन दबंग हत्यारों और माफियाओं को संरक्षण और साहस कहा से मिलती है जिनके आगे कानून और अदालत लाचार हो जाती हैं और बेखौफ होकर नरसंहार जैसे भीभत्स घटना को अंजाम देते हैं। वहां के हालात ऐसे हैं कि प्रत्यक्षदर्शियों से बात करने से उनकी जबान लड़खड़ा रही है । वे डरे और सहमे हुए हैं। देश में आदिवासियों की जान कितनी सस्ती है देखा जा सकता है। 25 से ज्यादा लोग गम्भीर रूप से घायल हैं जो जिला अस्पताल (राबर्ट्सगंज)और वाराणसी ट्रामा सेंटर में भर्ती हैं।
इस क्रूर व अत्याचारी घटने से आहत प्रदीप कोल ने आगे कहा कि जल,जंगल,जमीन से बेदखल आदिवासी किस आधार पर इसे अपना देश कहें ? बाजार और सत्ता के गठजोड़ से आदिवासी अधिक संख्या में पलायन और विस्थापन हो चुके हैं जो जंगलों में बचे हैं उनकी स्थिति बिना जड़ के पेड़ जैसी हो गयी है।आदिवासी सरकार और कॉरपोरेट की दोहरी हिंसा की मार झेल रहा हैं। नदियों, जंगलों और पहाड़ों से उनकी पहचान को समाप्त करने के साथ उनकी हत्या आम बात हो गयी है , कभी नक्सली के नाम पर तो कभी फर्जी एनकाउंटर के नाम पर हत्याएं जानबूझकर करवाई जा रही हैं । आदिवासियों की जान की कीमत कितनी सस्ती है, इसका असर मीडिया और आंदोलनों की सक्रियता में भी दिखती है।
वो आगे बताते हैं कि उम्भा गांव मेरे गांव से 6-7 किलोमीटर की दूरी पर है यह क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं। बहुत कम लोगों के पास जमीन है जिनके पास एक-दो बीघा है भी तो ज्यादातर लोगों को बंजर क्षेत्र दे दिए गए हैं।लेकिन अभी भी बड़ी जाति के दबंगों के पास ज्यादातर जमीनों पर कब्जा है। शासन और सत्ता सांठ-गांठ से खुले आम मनमानी भी करते हैं।आदिवासियों के जमीन पर जमींदारों का अभी जबरन कब्जा है।इसको हम जुलाई-अगस्त के महीनों वहां के कोर्ट-कचहरियों में देख सकते हैं। आदिवासियों के सदियों से चली आ रही जमीन की समस्याओं पर इसी समाज के सांसद से जिला प्रशासन मूकदर्शक बनकर दबंग जमींदारों के आगे नतमस्तक रहा है।
जिन आदिवासियों की हत्या हुई है उनमें तीन महिलाओं के साथ कुछ शादीशुदा नौजवान हैं जिनके बच्चे भी हैं जो डरे हुये हैं उनके भविष्य का क्या होगा?योगी सरकार की तरफ से पांच लाख कीऔपचारिकता पूरी हो गयी है।घटना के दूसरे दिन एसडीएम पहुँचते हैं। जिलाधिकारी अभी भी घटनास्थल पर नहीं पहुँचे हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व dgp पुलिस विक्रम सिंह ने इसे सिस्टम की लापरवाही बताया है उन्होंने कहा खुली गाड़ी में असलाह लहराते हुए गुंडे माफिया नगर में प्रवेश करते है और पुलिस के खुफिया तंत्र को भनक तक नही लगी तो इसे सिस्टम का फेलियर ही कहा जा सकता है।


