27 गांवों का संगम, तांदी नृत्य की गूंज, और देव डोली का दिव्य सफर — उत्तरकाशी के मेले में दिखी परंपरा की अनोखी झलक
🔥 ओपनिंग
“सर्द हवा, ऊँचे पहाड़, और घंटियों की मधुर आवाज़ें… उत्तरकाशी की वादियाँ इस वक़्त सिर्फ़ गूंज रही हैं — ‘डांडे की जातीर’ के जयकारों और ढोल-दमाऊं की थापों से। 27 गांवों के जनसैलाब ने देवभूमि को एक बार फिर भक्ति और उल्लास की महफिल में बदल दिया!”

🌿 आगे की कहानी
डांडे की जातीर की शुरुआत हुई कण्डारी गांव से, जब इष्ट देव राजा रघुनाथ की पालकी और निशान उठाए गए। गाँव के गुरु प्रसाद, सुमित माली, इन्द्र देव गौड़ और बृजमोहन गौड़ ने इस यात्रा की अगुवाई की।
डांडे पहुँचते ही देव प्रतिमा का स्नान और पूजा-अर्चना हुई। चारों तरफ ढोल, नगाड़ों की आवाज़ और फूलों की खुशबू। तांदी नृत्य में कदम थिरकते गए और लोगों के चेहरे पर भक्ति का सुकून झलक उठा।
इसी माहौल में एक और रंग जुड़ा — जब मशहूर छायाकार और निर्देशक सुरक्षा रावत ने यहाँ एक पहाड़ी गीत का फिल्मांकन किया। कैमरे के सामने अपनी अदाओं से सभी को लुभाया ऋषभ, गौरव, दिव्यांशु, सोहन और आयूषी ने।

“यह सिर्फ़ एक मेला नहीं, हमारी जड़ों से जुड़ने का मौका है,” — सुरक्षा रावत, निर्देशक।
मेले में ग्रामीणों ने रंग-बिरंगे स्टॉल लगाए। कहीं गरमा-गरम झंगोरे की खीर, तो कहीं लोक कला के सुंदर हस्तशिल्प। देव डोली शाम होते-होते खमण्डी मल्ली गांव पहुँची, जहाँ पारंपरिक पकवानों के साथ सामूहिक नृत्य की धूम मच गई।
अब यह देव डोली आगे के सफर पर निकलेगी — गातू और फोंणगांव होते हुए बाकी गांवों की परिक्रमा करेगी।
🎤 इमोशनल टच:
“हमारे लिए डांडे की जातीर सिर्फ़ आस्था नहीं, अपने पुरखों की परंपराओं को जीने का अवसर है,” — एक वृद्ध महिला की आँखों में छलकते आँसू, और मुस्कान साथ-साथ।
🌈 क्लोजिंग लाइन
“इन पहाड़ों की हवा में बसती है संस्कृति की खुशबू… और डांडे की जातीर जैसे मेले याद दिलाते हैं कि देवभूमि की असली रौनक — उसकी आस्था, उसकी कला, और उसके लोग हैं…!”
