“अल्मोड़ा का आयुर्वेदिक अस्पताल बना लाचार — संजय पाण्डे का प्रशासन पर सीधा हमला!”

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“दवाइयाँ नहीं, पंचकर्म बंद… मरीज परेशान, अधिकारी गोलमोल जवाब!”


🟩 ओपनिंग पैरा (Hook)

अल्मोड़ा शहर के बीचोंबीच स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय की हालत ऐसी हो गई है कि मरीज इलाज के बजाय निराशा लेकर लौट रहे हैं। समाजसेवी संजय पाण्डे ने इस ‘बदहाल अस्पताल’ को लेकर जिलाधिकारी और प्रशासन की असफलताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


🟦 मुख्य खबर (Body)

🔴 “दवा नहीं, उम्मीद टूट रही”
संजय पाण्डे के मुताबिक अस्पताल में महीनों से आवश्यक दवाइयों का अभाव है। मरीज पर्ची तो ले जाते हैं लेकिन दवा निजी दुकानों से महंगी खरीदने को मजबूर हैं।

🟢 “पंचकर्म सेवा सिर्फ कागजों में”
पंचकर्म जैसी विशिष्ट आयुर्वेदिक सुविधा लंबे समय से बंद पड़ी है। पाण्डे ने कहा, “यह सेवा रिपोर्टों में दर्ज है लेकिन मरीजों के लिए नहीं। ये जन स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।”

🔵 “कमरा नहीं है” — अफसर का जवाब
जिला आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. मोहम्मद शाहिद ने तर्क दिया कि “अस्पताल में अतिरिक्त कमरा नहीं है।” पाण्डे बोले, “यह तर्क हास्यास्पद है — दवा और सेवा का संबंध इच्छाशक्ति से है, कमरे से नहीं।”

🟣 जिलाधिकारी पर निशाना
पाण्डे ने कहा कि जिलाधिकारी अल्मोड़ा शहरवासियों की असली ज़रूरतों की अनदेखी कर रहे हैं। “यह सरकार की योजनाओं और बजट को पलीता लगाने जैसा है,” उन्होंने कहा।

🟡 मुख्य मांगें
– दवाइयों की तत्काल उपलब्धता
– पंचकर्म और अन्य सेवाओं की पुनः शुरुआत
– अस्पताल के लिए स्थायी भवन
– अधिकारियों और जिलाधिकारी की भूमिका पर उच्च स्तरीय जांच


🟩 स्थानीय रंग व उद्धरण (Local Color & Quotes)

“जनहित के मामलों में हम कभी समझौता नहीं कर सकते। यह चिकित्सालय उचित सेवाएँ प्रदान करने में विफल है और इस पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।”
संजय पाण्डे, सामाजिक कार्यकर्ता

स्थानीय लोग भी कहते हैं कि अस्पताल के बाहर भीड़ रहती है लेकिन अंदर दवाइयाँ और सेवाएँ नदारद हैं।


🟦 ड्रामा और चेतावनी (Drama & Warning)

संजय पाण्डे ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, ईमेल और व्हाट्सऐप के जरिए शिकायत भेजी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो वे RTI और जनहित याचिका तक ले जाएंगे।


🟥 समापन (Closing Line)

अल्मोड़ा का यह आयुर्वेदिक चिकित्सालय सिर्फ एक इमारत नहीं — यह नागरिकों की उम्मीद है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन उम्मीदों को फिर से जगा पाएगा या यह “जन स्वास्थ्य की सबसे बड़ी विडंबना” बनकर रह जाएगा?


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