“पढ़ाई की आड़ में अराजकता बर्दाश्त नहीं”- फायरिंग कांड के 48 घंटे में पुलिस का शिकंजा

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🚨 दून पुलिस का बड़ा एक्शन – यूनिवर्सिटी के 07 उपद्रवी छात्र गिरफ्तार!

फायरिंग कांड के 48 घंटे में पुलिस का शिकंजा कस गया, एसएसपी का सख्त संदेश – “पढ़ाई की आड़ में अराजकता बर्दाश्त नहीं”


📍 देहरादून | थाना प्रेमनगर
दून की शांत वादियों में छात्र उपद्रव का तूफ़ान उठा — और पुलिस ने लोहे की मुट्ठी से उसे दबा दिया।
दो दिन पहले प्रेमनगर इलाके में हुई फायरिंग ने पूरे शहर को हिला दिया था। इस घटना के तार यूनिवर्सिटी के दो गुटों की वर्चस्व की लड़ाई से जुड़े निकले।


🔴 24 घंटे में पहला आरोपी दबोचा

फायरिंग की गूंज थमी भी नहीं थी कि पुलिस ने 24 घंटे के भीतर पहला आरोपी — वेद भारद्वाज — को गिरफ्तार कर लिया।
पूछताछ में खुलासा हुआ कि यूनिवर्सिटी में वर्चस्व जमाने के लिए उसने साथियों संग मिलकर हवाई फायरिंग की।


🔴 फिर 07 उपद्रवी सलाखों के पीछे

एसएसपी देहरादून के आदेश पर प्रेमनगर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की और दोनों गुटों के 07 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया।
इन सभी को धारा 170 BNSS में पकड़ा गया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर भारी मुचलके पर पाबंद कराया गया।
👉 यूनिवर्सिटी प्रशासन को भी रिपोर्ट भेज दी गई है ताकि इन छात्रों पर कड़ी कार्रवाई हो।


📝 गिरफ्तार छात्र कौन हैं?

  • वैभव तिवारी (वाराणसी, यूपी)
  • उत्तम सैनी (सहारनपुर, यूपी)
  • मयंक चौहान (बिजनौर, यूपी)
  • आयुष (अमरोहा, यूपी)
  • युवराज (सहारनपुर, यूपी)
  • अर्जुन (देवबंद, यूपी)
  • दिव्य (बिजनौर, यूपी)

(सभी छात्र 19–22 साल के बीच, पढ़ाई की जगह उपद्रव में लिप्त पाए गए)


🔴 85 छात्र पहले ही हो चुके निष्कासित

दून पुलिस ने सिर्फ इस मामले में ही नहीं, बल्कि साल 2025 में अब तक 85 उपद्रवी छात्रों को यूनिवर्सिटी से निष्कासित करवाया है।
एक विशेष पुलिस टीम सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में छात्र गुटबाजी और आपसी विवादों पर नज़र रख रही है।


💬 एसएसपी देहरादून का सख्त संदेश

“पढ़ाई की आड़ में अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जो भी छात्र आपराधिक गतिविधियों में शामिल होगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।”


स्थानीय रंग:
देहरादून की गलियों और कैंपस में छात्र राजनीति का शोर नया नहीं है, लेकिन इस बार पुलिस की सख्ती ने साफ कर दिया है कि “दून अब अराजक छात्रों का अड्डा नहीं बनने दिया जाएगा।”


🔚 समापन लाइन

दून की वादियों में किताबों की आवाज़ गूंजनी चाहिए, गोलियों की नहीं। पुलिस का शिकंजा कस चुका है—अब गेंद यूनिवर्सिटी के पाले में है।


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