⚖️ देहरादून बना न्याय का मॉडल!एक ही दिन में 17,177 केस निपटाए,

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₹21.75 करोड़ का ऐतिहासिक समझौता ⚖️

साल की अंतिम राष्ट्रीय लोक अदालत में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन, जनता को मिला त्वरित और सुलभ न्याय


देहरादून | 13 दिसंबर 2025
शनिवार का दिन देहरादून के लिए न्याय के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। साल की अंतिम राष्ट्रीय लोक अदालत में जिले ने ऐसा प्रदर्शन किया कि पूरा प्रदेश देखता रह गया—
👉 सिर्फ एक दिन में 17,177 वादों का निस्तारण
👉 ₹21,75,49,988 की भारी-भरकम धनराशि पर आपसी समझौता


🔥 अदालतों में लंबित केस—एक झटके में हल

इस महाअभियान में

  • 10,188 लंबित मामले विभिन्न न्यायालयों में निपटाए गए
  • जिनमें ₹18.03 करोड़ से अधिक की राशि पर सहमति बनी

वहीं,

  • 6,991 प्री-लिटिगेशन मामले (अदालत जाने से पहले) सुलझे
  • ₹3.71 करोड़ का आपसी समझौता हुआ

👉 न मुकदमे की लंबी तारीखें,
👉 न खर्च का बोझ—
सीधा समाधान, सीधा न्याय।


🏛️ जिला जज के नेतृत्व में दिखा न्याय का संकल्प

यह ऐतिहासिक सफलता संभव हो पाई—
माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री प्रेम सिंह खिमाल के
कुशल, प्रेरणादायी और दूरदर्शी नेतृत्व से।

लोक अदालतों में न केवल फैसले हुए,
बल्कि सुलह, सौहार्द और विश्वास का माहौल भी दिखा।


📍 देहरादून से लेकर चकराता तक—हर कोर्ट में गूंजा न्याय

राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन हुआ—

  • देहरादून मुख्यालय
  • ऋषिकेश
  • विकासनगर
  • डोईवाला
  • मसूरी
  • चकराता

🔹 मोटर दुर्घटना क्लेम
🔹 पारिवारिक विवाद
🔹 चेक बाउंस
🔹 बैंक वसूली
🔹 श्रम व सिविल मामले
🔹 मोटर वाहन अधिनियम के शमनीय अपराध

हर वर्ग, हर विवाद—न्याय के दायरे में।


💬 क्या कहती हैं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव एवं वरिष्ठ सिविल जज
श्रीमती सीमा डुँगराकोटी ने कहा—

“लोक अदालतें न्याय को सरल, सुलभ और त्वरित बनाती हैं।
यह केवल केस निस्तारण नहीं, बल्कि समाज में शांति और विश्वास की स्थापना है।”

उन्होंने बताया कि

  • लोक अदालत के फैसले अंतिम और बाध्यकारी होते हैं
  • निस्तारण के बाद न्याय शुल्क भी वापस किया जाता है

📊 पहले भी दिखा चुका है देहरादून दम

इससे पहले
13 सितंबर 2025 की राष्ट्रीय लोक अदालत में भी
👉 लगभग 21,000 मामलों का निस्तारण
👉 पेंडेंसी घटकर एक लाख से नीचे आ गई थी


🔚 आख़िरी बात

जहाँ सालों तक केस लटकते हैं,
वहीं देहरादून ने दिखा दिया—
संवाद, सहमति और संवेदनशीलता से न्याय संभव है।

यह सिर्फ आंकड़ों की जीत नहीं…
यह आम आदमी के भरोसे की जीत है।

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