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गागर : शादी मे दुलहन को दहेज नहीं, रीति रिवाज और परंपरा का था हिस्सा – आओ फिर सुरू करें – कुसुम जोशी

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आज हम उत्तराखण्ड संस्कृति कि इस पोस्ट में गागर पर बात करने वाले हैं पहले रीत रिवाज के हिसाब से शादियों में बड़ी गागर दुल्हन को दी जाती थी और एक जमाने में पहाड़ों में जब भी लोग नल में पानी भरने आते तो नल में गागर ही गागर दिखाई देती थी और गागर को देखकर चर्चाएं भी होती थी गागरो का वजन उठाकर एक गागर से दूसरी गागर का अंदाजा लगाया जाता था किसकी गागर ज्यादा भारी (बढ़िया) है, उसकी मायके वालों की उतनी प्रशंसा होती थी।

कुसुम जोशी

गागर पर उत्तराखंड में काफी लोकगीत भी बने हैं। दुल्हन पक्ष की तरफ से दुल्हन को गागर दी जाती थी और उसी गागर से दुल्हन पहली बार अपने ससुराल वालों के लिए जल देवता की पूजा कर पानी ले जाती थी अब समय के साथ साथ लोगों का गागर के प्रति रुचि कम हो गई है अब गागर के बदले छोटे लौटे पर तांबे का लेप लगाकर दिया जाता है उसी से अब काम चला लेते हैं हालांकि कुछ लोग बड़ी गागर देते भी है तो वह लोग उसका घर मैं कम ही इस्तेमाल करते हैं, नए लोग नई सोच भी कह सकते हैं। आज भी हमारे घरों में मम्मी, बड़ी बहने, चाची, भाभी, आदि के मायके से दी गई गागर घरों में दिखाई देती है, हालांकि इसे दहेज के तौर पर नहीं देखा जाता है। यह पहाड़ों में की रीति रिवाज का एक हिस्सा है।
हमें लगता है आज भी अपने रीति रिवाज के हिसाब से वही पुरानी बड़ी गागर दुल्हन को देनी चाहिए यह छोटी-छोटी चीजें ही हमारी संस्कृति का हिस्सा/ पहचान है जिसे हमें आगे लेकर जाना है।




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