क्या आपको मालूम है कि पौराणिक, आध्यात्मिक व औषधीय महत्व वाला अमर कल्पवृक्ष ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) में भी मौजूद है। इसे पृथ्वी का पारिजात और देश का सबसे प्राचीन वृक्ष माना जाता है,जो लगभग ढाई हजार साल से यहां पर विद्यमान है। इस दिव्य अमर कल्प वृक्ष के सूखने की बे बुनियाद खबरो को खारिज करते हुए बताया गया कि यह अमर कल्प वृक्ष ही नही अपितु 50करोड़ सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रतीक है,इस वृक्ष पर हर साल इस मौसम में पतझड़ आता है और ये इस मौसम में ये ऐसा ही नजर आता है,लेकिन स्थानीय जानकारों का कहना है की कल्प तरु के सूखने की बात निराधार है हाँ मौसमी बदलाव का असर जरूर हो रहा है,लेकिन यह दिव्य पारिजात वृक्ष फिर से हरा भरा हो जाता है,असंख्य शाखाओं में पीपल की तरह फैले लगभग 22 मीटर व्यास वाले इस कल्पवृक्ष (शहतूत का पेड़) की ऊंचाई तकरीबन 170 फीट है। खास बात यह कि इस पर फूल तो खिलते हैं, मगर फल नहीं।
बताया जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर आदिगुरु शंकराचार्य ने तपस्या की थी। यहीं उन्हें दिव्य ज्ञान ज्योति की भी प्राप्ति हुई। इसके बाद सनातन धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना कर देश में एकता का सूत्रपात किया था। बदरीनाथ धाम में नारद कुंड से भगवान बदरी विशाल की मूर्ति निकालकर उसे फिर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया। कल्पवृक्ष के नीचे ज्योतेश्वर महादेव का पौराणिक मंदिर भी स्थित है।मान्यता है कि आदिगुरु शंकराचार्य ने इसी वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। साथ ही ‘शंकर भाष्य’, ‘धर्मसूत्र’ सहित कई ग्रंथों की रचना भी इसी वृक्ष के नीचे की गई। मान्यता है कि समुद्र मंथन से जो 14 रत्न प्राप्त हुए, उनमें समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला पारिजात वृक्ष भी था। जिसे देवराज इंद्र को दिया गया। इंद्र ने हिमालय के उत्तर में स्थित सुरकानन वन में इस वृक्ष को स्थापित किया।
माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे अपार सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होता है। यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, उसकी अवश्य प्राप्ति होती है। कल्पवृक्ष को कल्पद्रूप, कल्पतरु, सुरतरु, देवतरु, कल्पलता व पारिजात में नाम से भी जाना जाता है। जो सदा अनन (स्वर्ग का उपवन) में फूलता-फलता है।
