कूड़े से खेल रहे मौत के सौदागर

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उत्तराखंड प्रदेश को  क्या हाईकोर्ट सरकार चला रही है?

 क्या लोकतंत्र के तीनों पायदान अपने अपने जिम्मेदारियों का पालन ठीक से कर पा रहे हैं ?

यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि आए दिन कार्यपालिका के कामों में कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है , और कोर्ट  को आदेश निर्गत करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

 

 

 आखिर ऐसी स्थितियां क्यों आ रही हैं?  हम बात कर रहे हैं गंगा यमुना के मायके उत्तराखंड प्रदेश की  जहां देश और दुनिया के लोग गंगाजल से लेकर जाते है और खुद को पवित्र करते हैं,  लेकिन प्रदेश के हर बड़े शहर से पहले कूड़े के ढेर यह ये इशारा करते हैं कि आगे एक बड़ा शहर शुरू होने वाला है ,  जहां ज्यादा पढ़े लिखे और अमीर लोग निवास करते हैं ।

पिछले दिनों जब देवभूमि में कूड़े के ढेर और उसके निस्तारण को लेकर सोशल मीडिया मे  कई सवाल उठे, फिर भी समाधान की दिशा में कोई काम नहीं हुआ तो जितेंद्र वर्मा ने  हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका  दायर की । जिसके बाद कोर्ट से  सरकार को एक नई गाइडलाइंस जारी हुई।

तो क्या कूड़ा निस्तारण के लिए भी हाई कोर्ट को ही निर्देश देने होंगे?

क्या प्रदेश का अपना निकाय सिस्टम इसमें फेलियर साबित हो रहा है?

यह बात इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाईकोर्ट के डायरेक्शन के बाद शहरी विकास विभाग प्रत्येक जिले में जाकर बैठकों का दौर चला रहा है उसमें शहर के कूड़ा रहित होने की उम्मीद कम जबकि हाईकोर्ट को जवाब देकर अपनी नौकरी बचाने की प्रवृत्ति ज्यादा नजर आ रही है।  अधिकारियों की कोशिश यही रहती  है कि किस तरीके से फोटोग्राफ्स और पेपर वर्क से यह दिखाया जाए कि उनके द्वारा अलग-अलग स्थानों पर जिम्मेदार लोगों के साथ बैठक कर समाधान की दिशा मे आगे बढ़ा जा रहा है ।

यह बात सच है बिना जागरूकता के कूड़ा निस्तारण नहीं हो सकता लेकिन शहरी विकास विभाग द्वारा जो बैठक के आयोजित कर हाई कोर्ट को जवाब देने की कोशिश की जा रही है उस बैठक में भाग लेने वाले तमाम लोग तो  पहले से ही जागरूक हैं और वे  संबंधित विभागों मे ही काम करते हैं तो उनके बैठको  से यदि जागरूकता आती और कूड़ा निस्तारण हो पाता तो अब तक कब का हो चुका होता ।

तो बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड सरकार जमीनी स्तर पर इस प्रश्न का जवाब ढूंढने की तलाश करेगी कि आखिर कूड़ा बड़ी तादाद में क्यों जमा हो रहा है और उसका निस्तारण समय पर हूं क्यों नहीं रहा है?

दरअसल इस समय जो नीति शहरी विकास विभाग अथवा नगर निकाय अपना रहे हैं उसमें समाज के  सबसे अंतिम वर्ग को ही पॉलिथीन प्रतिबंध के नाम पर जुर्माना कर कर्ताब्य की इतिश्री कर ली जाती है,  जबकि जिन फैक्ट्रियों में पॉलीथिन बन रही है उनके लिए कोई गाइडलाइंस है ही नहीं। आज के दौर में जब पैकेजिंग से हर चीज आपके घर तक पहुंच रही है ऐसे में पॉलिथीन जब फैक्ट्री में बनेगी नहीं तो लोगों तक पहुंचेगी कैसे?  हैरानी की बात यह है कि गंगोत्री यमुनोत्री धाम में जहां से लोग पवित्र गंगाजल लेने आते हैं वहां लाखों की तादाद में बोतलबंद पानी के नाम पर प्लास्टिक का कचरा बिखेरा जा रहा है।  तो क्या बोतलबंद पानी की जगह अलग-अलग स्थानों पर आरओ  के पानी की रिफिलिंग  की व्यवस्था कर इस प्लास्टिक के कचरे को कम नहीं किया जा सकता ?

दूसरा सवाल खुद नगर निकाय है जो बार-बार लोगों को जागरूकता अभियान में यह बताने की कोशिश करती है कि हर घर से सुखा और गीला कूड़ा  अलग-अलग एकत्रित होना चाहिए ।

लेकिन अमूमन देखा गया है कूड़ा निस्तारण विभाग द्वारा जो गाड़ियां भेजी जाती है उसमें गीला और सूखा कूड़ा एक साथ एकत्र कर लिया जाता है।  ऐसे में उसको अलग करना मुश्किल हो जाता है और जो कूड़ा आसानी से निस्तारित हो सकता था उसका भी निस्तारण नहीं हो पाता और कूड़े के बड़े-बड़े ढेर लग जाते हैं जो दुर्गंध पैदा करते हैं और बीमारियों से लोगों को दिक्कतें होती हैं ।

नगर पालिका अध्यक्ष कहते हैं जिस तरह से उन्हें गाइडलाइंस मिल रही है उन्हें 6 महीने का समय दिया जा रहा है इस बीच नगर निकायों को यह देखना है कि किस-किस कंपनी के पैकेट्स कितनी बड़ी तादाद में शहर में आ रहे हैं और उसी के अनुरूप उन उन कंपनियों को अपने खाली प्लास्टिक पैकेट और को वापस लेने की बात कही जाएगी।

पालिका अध्यक्ष कहते हैं कि 6 महीना इस पर काम करने के बजाए सरकार , जीएसटी के माध्यम से उस डाटा को आसानी से निकाल सकती है जिसमें फैक्ट्री से या डिस्ट्रीब्यूटर से यह ये खाद्य पदार्थ के पैकेट चलकर आते हैं और आसानी से पता चलाया जा सकता है कि किस जिले में किस शहर में कितनी तादाद में पैकेट के साथ प्लास्टिक पहुंच रहा  हैं। इन प्लास्टिक को को एक स्कीम के तहत दुकानदार के माध्यम से वापस लिया जा सकता है या कंपनी इसके लिए कोई अलग से स्कीम चला सकती है।

बहरहाल कूड़ा निस्तारण के लिए सरकारी बैठको से बाहर निकाल कर आम जन को आम शहरी को सोचना होगा अन्यथा शहर कूड़े  के ढेर मे तब्दील हो जाएंगे और फिर दुर्गंध मे रहना हमारी नियति बन जाएगी >

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