रोड नहीं तो वोट नहीं!” – गंगोत्री धाम के पुरोहितों का गुस्सा फूटा, मुखवा गांव में पंचायती चुनाव का बहिष्कार

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मां गंगा की डोली जहां से होती है रवाना, वहीं गांव आज भी सड़क को तरस रहा है… गुस्साए पुरोहित बोले – “वोट क्यों दें, जब रास्ता ही नहीं मिला!”


ओपनिंग
उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ गंगोत्री धाम की हवा इन दिनों सिर्फ भक्ति की नहीं, बल्कि गुस्से की भी गूंज सुन रही है। गंगोत्री धाम के पुरोहितों का गांव मुखवा, जहां मां गंगा की डोली सालों से चली आ रही परंपरा के तहत रवाना होती है, इस बार चुनावी शोर से पूरी तरह खामोश है। वजह – गांववालों का दो टूक ऐलान: “रोड नहीं तो वोट नहीं!”



हर्षिल से मुखवा तक सड़क तो बन गई, पर मुखवा से जांगला होते हुए गंगोत्री राजमार्ग तक आज भी कच्चे, दुर्गम रास्ते ही हैं। यही वो रास्ता है जहां से मां गंगा की डोली हर साल कंधों पर सवार होकर गंगोत्री धाम पहुंचती है। मगर विकास की डोली अब तक यहां नहीं पहुंची।



गांव के पुरोहित गोविंद प्रसाद सेमवाल ने कहा –

“हमने प्रधानमंत्री जी के हर्षिल दौरे के वक्त अपनी मांग रखी थी। आश्वासन मिला, पर सड़क नहीं मिली। अब वोट किस बात का दें? हमारे लिए आस्था का रास्ता ही सबसे बड़ा रास्ता है।”


हर साल हजारों श्रद्धालु गंगोत्री धाम जाते हैं, मगर जिस गांव से यात्रा की शुरुआत होती है, वहीं के लोग आज भी खाई-नालों और फिसलन भरे पथरीले ट्रैक से गुजरने को मजबूर हैं। आपदा के वक्त हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है, विकास सिर्फ भाषणों में ही सिमटकर रह गया है।


मुखवा गांव की बुजुर्ग महिला कमला देवी की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने कहा –

“मां गंगा की डोली तो हमारे गांव से निकलती है, लेकिन हमारे लिए सड़क नहीं निकलती… आखिर कब तक ऐसे ही जीएंगे?”


पंचायती चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान कर ग्रामीणों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। प्रशासनिक अफसर भी यहाँ वहाँ चक्कर लगा रहे हैं, पर गांववालों के तेवर नरम होते नहीं दिख रहे।


कॉल टू रिफ्लेक्शन/क्लोजिंग लाइन
गंगा के पवित्र जल से जहां करोड़ों की आस्था जुड़ी है, वहीं उस आस्था की जमीन पर बसे गांव की ये आवाज सत्ता के गलियारों तक कब पहुंचेगी? सवाल यही है – क्या मां गंगा की डोली का रास्ता बन पाएगा, या फिर आस्था की राह यूं ही पथरीली रहेगी?

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