पहाड़ों की दरकती ज़मीन पर अब सरकार का सख्त कदम-उत्तराखंड को ₹125 करोड़ की सौगात

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भूस्खलन पर बड़ा वार!

— पाँच सबसे खतरनाक इलाकों में होगा स्थायी समाधान


⚡ केंद्र की हरी झंडी, धामी के प्रयास रंग लाए

उत्तराखंड के पहाड़ों पर लगातार बढ़ते भूस्खलन से दहशत में जी रहे लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है।
भारत सरकार ने ₹125 करोड़ की भूस्खलन न्यूनीकरण परियोजना को मंजूरी दे दी है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लगातार प्रयास और मार्गदर्शन से यह योजना राज्य तक पहुँची है।


💰 शुरुआत ₹4.5 करोड़ से

पहले चरण में ₹4.5 करोड़ की धनराशि जारी की गई है।
इससे अन्वेषण कार्य और विस्तृत DPR (Detailed Project Report) तैयार होगी।

सीएम धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को धन्यवाद देते हुए कहा:

“यह परियोजना पहाड़ों में भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों को स्थायी समाधान देने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।”


🏔️ यहाँ होगा काम, इन इलाकों को मिलेगी राहत

परियोजना के तहत पाँच सबसे संवेदनशील और खतरनाक इलाकों को प्राथमिकता दी गई है:

  1. मनसा देवी हिल बाईपास रोड, हरिद्वार
    • लगातार चट्टानें गिरने से खतरा।
    • कांवड़ यात्रा का वैकल्पिक मार्ग प्रभावित।
    • 50,000 से अधिक लोग सीधे संकट में।
  2. गलोगी जलविद्युत परियोजना मार्ग, मसूरी (देहरादून)
    • बरसात में सड़क पर भारी भूस्खलन।
    • आवाजाही ठप और सड़क को गंभीर नुकसान।
  3. बहुगुणा नगर भू-धंसाव क्षेत्र, कर्णप्रयाग (चमोली)
    • ज़मीन धंसने से मकान और सड़कें चकनाचूर।
    • भूगर्भीय दृष्टि से बेहद अस्थिर इलाका।
  4. चार्टन लॉज क्षेत्र, नैनीताल
    • सितंबर 2023 के भूस्खलन ने घरों को तोड़ा, परिवारों को विस्थापित किया।
    • जल निकासी की कमी और लगातार बारिश वजह।
  5. खोतिला-घटधार क्षेत्र, धारचूला (पिथौरागढ़)
    • नेपाल सीमा पर भीषण भूस्खलन और भू-कटाव।
    • सीमा सुरक्षा तक प्रभावित।

🛑 पहाड़ों का दर्द, अब उम्मीद का सफर

भूस्खलन ने उत्तराखंड के गाँव-शहर, सड़क-घर सबको बार-बार लहूलुहान किया है।
हर बरसात में लोगों की जान जोखिम में रहती है, घर उजड़ते हैं और सड़कें टूट जाती हैं।

अब यह परियोजना पहाड़ों को नई सांस दे सकती है।


✍️ सोचने वाली बात

पहाड़ टूटे तो सिर्फ़ मिट्टी और चट्टानें नहीं गिरतीं—गिरते हैं लोगों के सपने, उजड़ती हैं पीढ़ियाँ।
अगर यह योजना समय पर और ईमानदारी से पूरी हुई, तो उत्तराखंड के पहाड़ सिर्फ़ सहेंगे नहीं, बल्कि सुरक्षित खड़े रहेंगे।

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