जोशीमठ क्षेत्र के लोगों को किया जाए पुनस्र्थापितः यूकेडी

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रुद्रप्रयाग। जोशीमठ क्षेत्र के प्रभावितों के पुनर्स्थापना सहित अन्य विभिन्न मांगों को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है। ज्ञापन में यूकेडी के केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एपी जुयाल ने कहा कि मध्य हिमालय का यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। इसमें भी उत्तराखण्ड से 2 बड़े भ्रंश गुजरते हैं, जिन्हें भूविज्ञानी मुख्य केंद्रीय भ्रंश और मुख्य सीमांत भ्रंश के नाम से परिभाषित करते हैं। नई पर्वत-श्रृंखला होने के कारण हिमालय अभी विकासमान और अत्यंत कच्ची स्थिति में है और मुख्य केंद्रीय भ्रंश के लगातार सक्रिय रहने के कारण यहाँ भूस्खलनों तथा भूधँसाव की प्रक्रिया निरन्तर गतिमान है।
हिमालयी क्षेत्र मानसून को रोक कर देश को वर्षा की बड़ी सौगात देता है जिससे यहाँ से अनेक सदानीरा नदियां उद्गमित होकर देश को सम्पन्नता प्रदान करती हैं। बादलों के टकराने से यहाँ अनेक बार विध्वंसक वर्षा से भी धरती विनाशक स्वरूप धारण करती है और जन-धन की भारी हानि होती है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने इस क्षेत्र में निवास के कुछ मानदण्ड निर्धारित किये थे, जिससे प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित हो और प्रकृति तथा प्राणी एक-दूसरे के पूरक बनकर दीर्घजीविता का आदर्श स्थापित करें लेकिन मनुष्य के अहंकार, लोभ और प्रकृति पर विजय के दम्भ ने इस समन्वय को बिगाड़ कर रख दिया है, जिसका परिणाम जोशीमठ और पूरे हिमालय में विनाशक रूप में हमारे सामने है।
यूकेडी के जिलाध्यक्ष बुद्धिबल्लभ ममगाई एवं वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष भगत चैहान ने कहा कि जोशीमठ के बारे में सर्वविदित है कि यह एक बड़े भूस्खलन पर बसा हुआ है जिसकी आंतरिक संरचना अत्यंत कमजोर है और धरती की भार-वहन क्षमता अत्यंत सीमित है। इस तथ्य की अनदेखी करते हुए हमारे योजनाकारों और सरकारों ने इन तथ्यों की उपेक्षा की और जोशीमठ की कमजोरी के अनुरूप व्यवहार निर्धारित करने की बजाय यहाँ बसाहतों और भारी निर्माण कार्यों द्वारा इसको अस्थिर करने की एक होड़ जैसी शुरू कर दी। कमजोर धरातल की अनेक ऐतिहासिक दुर्घटनाओं की अनदेखी कर जोशीमठ जैसी पौराणिक-धार्मिक नगरी का अस्तित्व ही दाँव पर लगाने का कुत्सित प्रयास हमारी सरकारों ने किया है। विकास के नाम पर विनाश की फसल उगाने की कोशिशों के कारण ही आज यह नगर विनाश की दिशा में काफी आगे तक बढ़ गया है। विकास के पागलपन ने इस ऐतिहासिक धार्मिक नगर को मिटाने का प्रपंच रच दिया है और इसकी खुशहाल आबादी को बेघर कर बेहाली के आँसू बहाने के लिए मजबूर कर दिया गया है। सरकार की नीतियों और उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने 5-6 दशकों के भीतर ही इस सीमान्त उभरते शहर को बर्बादी के मुहाने पर पहुँचा दिया है।
यूकेडी के केंद्रीय मीडिया प्रभारी मोहित डिमरी ने कहा कि यह चर्चा आज जन-जन के मुँह पर है कि 47 वर्ष पहले यानी 1976 में जोशीमठ की कमजोर होती रग पर पर्यावरणविद चंडीप्रसाद भट्ट ने हाथ रखकर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जो निवेदन पहुँचाया था और उस पर उ प्र सरकार द्वारा गठित महेश चंद्र मिश्रा समिति ने जो प्रस्ताव सरकार के सामने रखे थे, उन पर कार्यवाही हो गई होती तो जिजीविषा से भरपूर जोशीमठ नगर इस तरह दम तोड़ने की स्थिति में न होता और न यहाँ के लोगों का जीवन खतरे और अनिश्चय के भँवर में फँसा होता। इसलिए हमारा मानना और कहना है कि जोशीमठ नगर के अस्तित्व को खतरे में डालने और उससे आबादी के एक बड़े हिस्से को खतरे में डालने का जघन्य अपराध हमारी सरकारों और नीति-नियन्ताओं ने किया है। केंद्रीय महामंत्री देवेंद्र चमोली, संगठन मंत्री विष्णुकांत शुक्ला, केंद्रीय सर्वोच्च सलाहकार समिति सदस्य बलबीर चैधरी, केंद्रीय मंत्री सुबोध नौटियाल, केंद्रीय संगठन सचिव पृथ्वीपाल रावत, केंद्रीय प्रचार मंत्री जितार जगवाण ने कहा कि प्रभावितों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा कर उनकी रहने, खाने की समुचित व सुरक्षित व्यवस्था की जाय। इसमें उनके स्वास्थ्य, चिकित्सा, बच्चों की शिक्षा तथा देखभाल की सर्वांगीण व्यवस्था भी शामिल हो। साथ ही खतरनाक हो चुकी बस्तियों के मकानों को तोड़ने से पहले उनका मूल्यांकन किया जाय और मुआवजे की राशि का लिखित अनुबंध-पत्र प्रभावितों को दिया जाय। पुनर्वास की व्यवस्था की एक सर्वमान्य महायोजना प्रभावितों को विश्वास में लेकर साथ-साथ तैयार की जाय, जिसमें उनकी आजीविका के पुनर्स्थापन की योजना भी शामिल हो।यूकेडी नेताओं ने कहा कि मिश्रा समिति तथा उसकी उप-समिति के जल निकास, सघन वानस्पतिक आवरण तैयार करने, पेड़ काट कर ईंधन की पूर्ति के बदले खाना पकाने और आग तापने के लिए वैकल्पिक साधनों की बढोत्तरी जैसे सुझावों का क्रियान्वयन पूरी ईमानदारी से कराया जाय, जिसमें कार्यदायी संस्थाओं की, कार्यों को परिणामपरक बनाने की जिम्मेदारी भी शामिल हो। जोशीमठ विकास खण्ड में भारी निर्माण-कार्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाय और इन कार्यों को भूगर्भीय स्वीकृति देने वाले कथित विशेषज्ञों के विरुद्ध कार्यवाही की जाय। इसके अलावा निर्माण कार्यों में हर प्रकार के विस्फोटकों का प्रयोग सख्ती से प्रतिबंधित किया जाय और इसका उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्यवाही की जाय। जोशीमठ की धरातलीय संवेदनशीलता का व्यापक अध्ययन कर भूक्षरण, भूस्खलन, भूधँसाव वाले क्षेत्रों का चिह्नांकन व मानचित्रीकरण कर, इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के भवन निर्माण को प्रतिबंधित किया जाय। यूकेडी संरक्षक मंडल के सदस्य कल्याण सिंह पुंडीर, विक्रम सिंह सजवाण, गजपाल रावत, अनुशासन समिति के अध्यक्ष राय सिंह रावत ने कहा कि अतिक्रमणकारियों की तरफ से आँखें मूँदे रखने वाले, अपने न्यस्त स्वार्थों के लिए इसे प्रोत्साहित करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत कार्यवाही का कानूनी प्राविधान किया जाय। यूकेडी नेताओं ने यह भी कहा कि जन्म से अपनी मातृभूमि में रहने वाले प्राणी को अपने घर खेत खलिहानों से अत्यंत मोह रहता है। बेटियां ससुराल जाते वक्त व बेटे जब रोजगार के लिए अपना घर छोड़कर जाते हैं तो वे बहुत भावुक हो जाते हैं। यहां तो सपरिवार पलायन की पीड़ा समेट कर लोग अन्यत्र विस्थापन को विवश हो रहे हैं जिसकी वेदना का अंदाजा लगाना मुश्किल है। परंतु पालतू पशुओं को बेसहारा छोड़कर कैसे जायं उनकी विवशता में यह भी संकोच बना हुआ है। अतः हम यह भी मांग करते हैं कि विस्थापन को विवश हो रहे परिवारों के पालतू पशुओं के विस्थापन, रहने व चारा पानी की भी समुचित व्यवस्था की जाय।

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