हमारे देश में नदियों को भी माता का रूप दिया गया है पुराणो मे जिस तमसा नदी का जिक्र आता है उसे बाद में अंग्रेजों ने टोंस नदी का नाम दिया यह नदी उत्तराखंड सहित 5 स्थानों पर बहती है। मान्यता है कि प्रयागराज के पास इस तमसा नदी के किनारे ही महर्षि बाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिली थी इस स्थान पर एक भव्य मंदिर निर्माण के लिए लंबे समय से प्रयास चल रहे हैं, जो अंजाम तक नहीं पहुंच सके। यही वजह है कि आज भाजपा नेता टोंस नदी को पौराणिक और सांस्कृतिक विरासत घोषित करने के लिए 10 दिन की तमसा परिक्रमा यात्रा पर निकल पड़े हैं
उत्तरप्रदेश के प्रयागराज जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर करछना तहसील के पानासा गाँव और मेजा तहसील के चौकी गाँव के बीच तमसा जिसे अंग्रेजो ने टोंस नदी का नाम दिया बहती है । इंटर कॉलेज के पूर्व प्रवक्ता श्री सुरेशचंद्र शर्मा ने मेरु रैबार को नदी के इतिहास के बारे मे बताते हुए कहा कि यहाँ महर्षि वाल्मीकि जी ने नदी के किनारे तपस्या कर रामायण की रचना की थी । देश में अन्य 5 स्थानो पर जो टोंस नदी बहती है उसके बार मे भी unhone विस्तार से बताया ।
वर्ष 2006 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष पंडित केशरी नाथ त्रिपाठी जो बाद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी बने थे इस स्थान को पर्यटन विभाग से बाल्मीकी तपोस्थली घोषित करने की घोषणा की थी । सुरेशचंद्र शर्मा ने अपनी 5 विश्वा जमीन भी पर्यटन विभाग को इसी उम्मीद के साथ daan कर दी है इसके साथ भाजपा नेता ने भी टोंस नदी को पौराणिक स्थान और सांस्कृतिक विरासत घोषित कराने के लिए 10 दिन की तमसा परिक्रमा यात्रा शुरू की है । उत्तरप्रदेश की 4 विधानसभाओ के लगभग 100 गाँव से होते हुए वे तमसा नदी की परिक्रमा पूर्ण करेंगे । उनके इस यात्रा में निषाद पार्टी सहित क्षेत्र के बच्चे, बूढ़े, महिलाओं 9 जवान सहित सैकड़ो के संख्या में मौजूद रहे
मान्यता है कि
प्रभु श्रीराम ने वनवास के दौरान एक रात इसी स्थान पर गुजारी थी। यहां से वो भारद्वाज ऋषि के आश्रम प्रयागराज पहुंचे। उनके आदेश के बाद चित्रकूट के लिए रवाना हुए। इन तथ्यों का जिक्र वाल्मीकि की रामायण में भी मिलता है
तमसा नदी का उदमगम अकबरपुर के ताल से है और ये बलिया में गंगा में विलीन हो जाती है। वाल्मिकि रामायण से प्रथम खंड के बाल सर्ग के पेज-32 पर इसका जिक्र मिलता है। इसमें बताया गया है कि महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्य के साथ तमसा नदी के किनारे ऐसे स्थान पर (जहां मंदिरों की श्रृंखला थी) संध्या वंदन किया था।
इस दौरान एक बहेलिए ने रति क्रीड़ा में लीन क्रोंच पक्षी का वध कर दिया था। महर्षि वाल्मीकि ने इस पर एक काव्य लिखा था। इस काव्य को देख भगवान ब्रह्मा ने महर्षि की प्रसंशा की और उन्होंने रामायण लिखने की प्रेरणा दी। इसके बाद उन्होंने वाल्मिकि रामायण लिखी।
तमसा नदी पहले मंदिर के किनारे से होकर बहती थी। इसके बारे में भी साक्ष्य है। बताया जाता है कि शहर में आने वाली बाढ़ के मद्देनजर अंग्रेजी शासन काल में नदी की धारा को मोड़ा गया था। इसके बाद से नदी शहर के किनारे-किनारे बहती है। नदी का रास्ता बदलने के बाद इस भूमि पर अब कई निर्माण खड़े हो गए हैं।
