“दिल्ली के साथ अब देहरादून में भी गूंज रही उत्तराखंड की बोली! नन्हे बच्चों ने पारंपरिक खान-पान से जगाई अपनी संस्कृति की अलख”
गंगोत्री एनक्लेव में बच्चों ने दिखाई संस्कृति की ताकत, प्रतियोगिता में छाए नन्हे प्रतिभागी
देहरादून/दिल्ली। आधुनिकता की दौड़ में जहां नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है, वहीं गंगोत्री एनक्लेव सोसाइटी में ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हर उत्तराखंडी का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उत्तराखंडी बोली-भाषा की कक्षा के तहत आयोजित पारंपरिक खान-पान एवं भोजन प्रतियोगिता में बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लेकर अपनी संस्कृति के प्रति गहरा लगाव दिखाया।

प्रतियोगिता में यशिका रावत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान हासिल किया, जबकि आयुष ममगाई ने द्वितीय स्थान प्राप्त कर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। बच्चों की प्रतिभा और आत्मविश्वास ने कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों का दिल जीत लिया।
कार्यक्रम में सोसाइटी अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार गिरीश गैरोला, सचिव राजेश कोठारी, राकेश कोठियाल, कल्पना रावत, कविता कोठारी और राखी मन्द्रवाल सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। सभी ने बच्चों के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे संस्कृति संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल बताया।
कार्यक्रम का संचालन कर रही शिक्षिकाएं श्रीमती सुनीता बहुगुणा और नन्दी बहुगुणा ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि—

“भाषा और संस्कृति केवल किताबों से नहीं, बल्कि उसे जीने और अपनाने से बचती है। बच्चे जब स्वयं सीखते और करते हैं, तभी अपनी विरासत से सच्चा जुड़ाव बनता है।”
उन्होंने बताया कि डा. विनोद बछेती के कुशल नेतृत्व में बंजारावाला, देहरादून में पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष भी उत्तराखंडी बोली-भाषा की विशेष कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। 9 अगस्त तक प्रत्येक रविवार अलग-अलग नवाचारी प्रतियोगिताओं और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, खान-पान और लोकजीवन से परिचित कराया जाएगा।
इस अनोखी पहल का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता कराना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के मन में अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गर्व और अपनापन पैदा करना है।
संस्कृति तभी जीवित रहेगी, जब नई पीढ़ी उसे सिर्फ पढ़ेगी नहीं… बल्कि उसे जीएगी भी। यही संदेश इस प्रेरणादायक आयोजन ने पूरे समाज को दिया।