🟢 संजय पाण्डे की पहल से
लगभग एक साल से परेशान अल्मोड़ा की जनता के लिए आज राहत की बड़ी खबर है।
जिस मुद्दे पर राजनीति मौन थी, वहाँ एक सामाजिक कार्यकर्ता की जिम्मेदारी बोल पड़ी।
👉 अल्मोड़ा नगर निगम परिसर स्थित जन सुविधा केंद्र में खाता-खतौनी की ऑनलाइन सेवा अब फिर से शुरू होने जा रही है।
यह जानकारी रेवेन्यू बोर्ड द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे को आधिकारिक रूप से मोबाइल संदेश के माध्यम से दी गई।

⏳ एक साल की परेशानी, अब खत्म होने को
पिछले करीब 12 महीनों से खाता-खतौनी सेवा बंद थी।
- किसान भटकते रहे
- बुजुर्ग लाइनें काटते रहे
- दूरस्थ गांवों से आए लोग खाली हाथ लौटते रहे
मामूली राजस्व कार्यों के लिए लोगों को शहर से बाहर चक्कर लगाने पड़ रहे थे—और सिस्टम खामोश बना रहा।
💻 साइबर अटैक ने रोकी थी सेवा
रेवेन्यू बोर्ड के अनुसार,
“पिछले वर्ष हुए साइबर अटैक के कारण जन सुविधा केंद्र की तकनीकी व्यवस्था ठप हो गई थी।”
अब तकनीकी सुधार पूरा कर लिया गया है और
📅 जनवरी 2026 से सेवा दोबारा शुरू की जाएगी।
🏢 दोपहर 12 बजे तक मिलेंगी राजस्व सेवाएं
सेवा बहाल होने के बाद
📍 नगर निगम परिसर स्थित जन सुविधा केंद्र
🕛 दोपहर 12 बजे तक
खाता-खतौनी सहित अन्य राजस्व कार्यों का निस्तारण करेगा।
यह कदम खासकर ग्रामीण और बुजुर्ग नागरिकों के लिए बड़ी राहत है।
📨 कुमाऊँ कमिश्नर से रेवेन्यू बोर्ड तक पहुँची आवाज
इस पूरे मुद्दे को
सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने
- तथ्यों के साथ उठाया
- दस्तावेज़ों के साथ रखा
- पहले कुमाऊँ कमिश्नर, फिर रेवेन्यू बोर्ड तक पहुँचाया
और नतीजा—
👉 सेवा बहाली का रास्ता साफ।
✋ बिना धरना, बिना शोर—फिर भी जीत
इस संघर्ष की सबसे खास बात—
❌ न धरना
❌ न नारे
❌ न भीड़
✔ सिर्फ संवाद
✔ सिर्फ तर्क
✔ सिर्फ जनहित
यह साबित हो गया कि
शांत और गंभीर प्रयास भी सिस्टम को झुका सकते हैं।
❓ राजनीति की चुप्पी पर सवाल
संजय पाण्डे ने तीखे शब्दों में कहा—
“जो राजनीतिक दल रोज़ सड़कों पर दिखते हैं,
वे ऐसे असली जनहित के मुद्दों पर पूरी तरह चुप रहे।
जनता को नाटक नहीं, समाधान चाहिए।”
🏆 पहले भी दिखा चुके हैं परिणाम
यह पहली बार नहीं है जब
संजय पाण्डे के प्रयासों से
जनता को सीधा फायदा मिला हो।
पहले भी वे ऐसे कई काम करवा चुके हैं,
जो बड़े-बड़े नेता भी सालों में नहीं कर पाए।
✨ आख़िरी बात
अल्मोड़ा की जनता के लिए यह सिर्फ़ सेवा बहाली नहीं—सम्मान की वापसी है।
👉 यह खबर एक सवाल छोड़ जाती है—
क्या असली जनसेवा राजनीति से बाहर भी संभव है?
और जवाब भी देती है—
हाँ… अगर नीयत साफ हो और इरादा मजबूत हो।
