✨ परिस्थितियों से लड़ती बेटियाँ, सपनों को संवारता प्रशासन ✨
देहरादून | 09 जनवरी 2026
जब हालात पढ़ाई रोकने पर मजबूर कर दें, तब अगर कोई हाथ थाम ले—तो सपने फिर से उड़ान भरते हैं। देहरादून में कुछ ऐसा ही हुआ, जहाँ जिलाधिकारी सविन बंसल ने विषम परिस्थितियों से जूझ रहीं दो होनहार बेटियों की शिक्षा में नई जान फूंक दी। सीएसआर फंड और ‘नंदा–सुनंदा’ प्रोजेक्ट के सहारे, भविष्य की दो कहानियाँ फिर से लिखी जा रही हैं।
🎓 जीविका अंथवाल: आईसीयू की चिंता, लेकिन सीए बनने का जज़्बा ज़िंदा
बी.कॉम द्वितीय वर्ष की छात्रा जीविका अंथवाल का सपना है—चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना।
लेकिन घर में हालात कठोर हैं। पिता गंभीर लीवर रोग से जूझते हुए आईसीयू में भर्ती हैं। सीमित साधनों में परिवार की पूरी जिम्मेदारी माँ के कंधों पर है।
माँ की एक दरख़्वास्त पर प्रशासन हरकत में आया।
👉 सीएसआर फंड से 1 लाख रुपये सीधे जीविका के खाते में।
👉 पढ़ाई निर्बाध रहे, इसके लिए लैपटॉप भी मुहैया कराने की प्रक्रिया शुरू।
यह सिर्फ़ आर्थिक मदद नहीं—यह भरोसा है कि मेहनत रंग लाएगी।
🩺 नंदिनी राजपूत: संघर्षों से निकलकर डॉक्टर बनने की तैयारी
कक्षा 11 की छात्रा नंदिनी राजपूत के पिता का 2018 में निधन हो चुका है। माँ—आंगनवाड़ी कार्यकर्ता—सिलाई कर तीन बेटियों की पढ़ाई चला रही हैं।
नंदिनी का लक्ष्य साफ़ है—नीट पास कर डॉक्टर बनना।
परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने यहां भी संबल दिया।
👉 सीएसआर फंड से 1 लाख रुपये की सहायता।
👉 ‘नंदा–सुनंदा’ योजना से शिक्षा का पुनर्जीवन।
संदेश साफ़ है—सपने हालात नहीं देखते।
🏛️ ‘नंदा–सुनंदा’: जहाँ शिक्षा को मिलता है नया जीवन
माननीय मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन का फोकस साफ़ है—बेटियों की शिक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा,
“सीएसआर फंड का उद्देश्य ज़रूरतमंद और पात्र बच्चों की पढ़ाई को जीवित रखना है। बेटियाँ अपने हौसले और आत्मविश्वास को कभी बुझने न दें।”
टीमवर्क की सराहना के साथ, संदेश भी सशक्त—योग्य को अवसर, सपनों को सहारा।
🔥 अंतिम पंक्ति
यह खबर सिर्फ़ दो बेटियों की नहीं—
यह उस ‘स्पार्क’ की है, जो हालात की आँधी में भी बुझने नहीं दी गई।
क्योंकि जब प्रशासन साथ खड़ा हो, तो सपने मंज़िल तक ज़रूर पहुँचते हैं।
