उत्तराखंड मे बीजेपी के दूसरे कार्यकाल मे जो बदनामी हिस्से आई उसके बाद बीजेपी के बड़े नेता सांसद विधायक मंत्री और खुद सीएम जिस तरह से दिल्ली की तरफ दौड़ लगा रहे है उसके बाद लोगो मे भविष्य को लेकर चर्चाओ का दौर चल पड़ा है
विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी के फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट के भी फैसले की मुहर लग गई है, यानी रितु खंडूरी ने जिन कर्मचारियों को बर्खास्त करने का फैसला लिया था वह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने भी सही मान लिया है , जायज मान लिया है।
यानी रितु खंडूरी के फैसले पर पहले हाई कोर्ट डबल बेंच की और अब सुप्रीम कोर्ट की मुहर यह बताता है कि राजनैतिक रूप से रितु खंडूरी की यह बहुत बड़ी जीत है साथ ही सरकार पर सवालिया निशान भी है।
फैसला पक्ष में आया तो सुप्रीम कोर्ट का आभार भी स्पीकर ने जताया यह स्वाभाविक भी है लेकिन सियासी तौर पर बड़ा महत्वपूर्ण सवाल ये हैं कि जिस सरकार में यह भर्तियां हुई हैं और जिस तरीके से गड़बड़ियों की शिकायतें पहले से आई हैं क्या सरकार में जिम्मेदार लोगों पर भी कोई कार्यवाही होगी या नहीं ।
प्रेमचंद अग्रवाल जब इस स्पीकर थे तब उन्होंने भर्तियां करवाई थी उससे पहले गोविंद सिंह कुंजवाल के कार्यकाल में भी वही भर्तियां हुई थी जिनकी जांच भी कराई गई थी । विचलन के हथियार से यह भर्ती की गई थी। अब बड़ा महत्वपूर्ण यह है कि इस पूरी सियासी बिसात में जो 228 कर्मचारियों की नौकरियां जा चुकी हैं तो आगे का रास्ता क्या होगा, वह तो नहीं मालूम लेकिन लड़ाई अब इस बात को लेकर भी है कि क्या जिन लोगों ने यह भर्तियां करवाई उन पर भी गाज गिरेगी या नहीं
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सफेद पोशों पर कार्यवाही होगी या फिर सत्ता की पावर उन्हें बचा ले जाएगी, अब इसके लिए उत्तराखंड की जनता इंतजार कर रही है लेकिन दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि उत्तराखंड बनने के बाद बाद से जो भी भर्तियां हुई विधानसभा में उन भर्तियों में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है, ऐसे तथ्य सामने है । ऐसे में इस बात को लेकर सवाल है कि जब प्रक्रिया एक है तो फिर नौकरी सिर्फ 2016 के बाद वालों की क्यों जाएगी? क्या उससे पहले वालों की नौकरी पर भी खतरा है? क्या सरकार उस पर भी कोई फैसला लेगी ? इसको लेकर भी इंतजार करना होगा, लेकिन दूसरी तरफ यह जरूर कहा जा सकता है कि रितु खंडूरी का जलवा बरकरार है और सरकार अब निशाने पर आ चुकी है
