लोकसभा चुनाव 2024 की दहलीज पर खड़े उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का मसूरी में मंथन चिंतन शिविर हो , आईएस वीक अथवा जिलों में सुशासन और जन शिकायत शिविर ,
सभी में एक बात निकल कर आती है कि अधिकारी जनता से जुड़े मुद्दों पर बचते नजर आते हैं, फाइलों पर ऑब्जेक्शन लगाए जाते हैं और फाइलें टेबल ऊपर महीना तक अटकी रहती हैं।
जनसुनवाई के नाम पर समाधान के समय कानून की दलील दी जाती है और समस्या का समाधान नहीं हो पाता,
यही वजह है कि जिस समस्या का ब्लॉक स्तर पर समाधान हो जाना चाहिए वह जिले मे आती है और जिले की समस्या मुख्यमंत्री दरबार में पहुंच रही है , सोचने वाली बात यह है की जनता दरबारों में इतनी भीड़ क्यों बढ़ रही है? क्यों ब्लॉक और जिला स्तर पर अधिकारी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे हैं ? जाहिर है यदि किसी भी समस्या के समाधान में दो या दो से अधिक विभागों जुड़े हुए हैं तो उसे आपसी सामंजस्य के आधार पर उससे बड़ा अधिकारी आसानी से निपटा सकता है , लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक ही विभाग से जुड़े मसले भी जिले से होकर प्रदेश तक पहुंच जाते हैं और ज़्यादातर का समाधान फिर भी नहीं हो पाता और उन्हे अगली डेट मिल जाती है।
क्या वजह है कि अधिकारी डीएम या सीएम की तो सुन लेता है और गाँव से आए फरियादी कि बात तक ठीक से नहीं सुनता ? जाहीर है कि वे अपनी शिकायत का कोई डर नहीं कोई खौफ नहीं ?
गरीब इंसान जो गांव के छोर पर बैठा हुआ है उसे राजधानी तक पहुंचने के लिए किराया और रहने खाने के लिए भी पैसे का जुगाड़ करना होता है एक दो बार चक्कर काटने के बाद वो इसे अपनी किस्मत समझ कर चुपचाप बैठ जाता है,
लेकिन क्या कभी इन मंथन चिंतन शिविरों में इस बात का जिक्र हुआ की समस्या का समाधान होता क्यों नहीं है?
अगर गौर करें तो पाएंगे कि आम लोगों की समस्याओं पर अधिकारी कानून का अड़ंगा लगाकर अपने हाथ खड़े कर देते हैं, ऐसे मौके पर जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वह मौके और परिस्थिति को देखते हुए अगर जरूरत है नियम कानूनों में ढील देकर मामले का मौके पर ही समाधान करवाएं, लेकिन ऐसा होता नहीं है
अगर सिर्फ नियम कानून से ही सरकार चल जाती, राजकाज चल जाता तो फिर नेताओं और मंत्रियों की क्या जरूरत थी? अधिकारी कानून के हिसाब से किताबें पढ़कर प्रदेश की सरकार चला सकते थे
और यदि नेताओं के कहने से ही सब कुछ होना है तो अधिकारियों की जरूरत ही क्या है , कानून पढ़ने की जरूरत ही क्या है ? लोकतंत्र और संविधान की मोटी पोथी को देखने की जरूरत ही कहां पड़ रही है?
इन शिविरो मे जो बात जो सामने आई है वह यह है की इन तमाम मंथन चिंतन शिविर मे जो अमृत निकल कर आया है, उस पर जब तक अमल नहीं हुआ तब तक देश और प्रदेश सुशासन की राह पर नहीं चल सकता और सिर्फ चुनाव के दौरान ही जनसुनवाई और सुशासन की बात सीमित हो कर रह जाएगी,
अगर वास्तव में सुशासन की बात करनी है तो नेताओं और अधिकारियों के बीच सामंजस्य बैठाना होगा और आम लोगों को भी अपने हाथ जोड़कर अधिकारियों के सामने गिड़ गिड़ाने की उस पुरानी राजशाही वाली परंपराओं को छोड़ना होगा। वहीं अधिकारियों को साहब वाली फीलिंग छोड़कर जनसेवक वाली फीलिंग अपनानी होगी । हैरानी की बात तो ये यह है कि प्रदेश में सेवा का अधिकार और उपभोक्ता कानून अस्तित्व मे होने के बावजूद भी हमें संबंधित विभाग के सामने फरियादी की तरह हाथ जोड़कर खड़े होना पड़ता है और अधिकारी साहब वाली अपनी पृष्ठभूमि से बाहर ही नहीं कर पाते, अब जरूरत आन पड़ी है कि ऐसे साहब लोगों को संविधान की भाषा में समझाया जाए कि उन्हें जनता के काम कैसे करने है , तभी प्रदेश और देश में सुशासन स्थापित होगा और वास्तव में लोकतंत्र में जो कहा गया है कि जनता से चुनी हुई सरकार और जनता के लिए चुनी गई सरकार अपना चुनाव करने वाली जनता के साथ न्याय कर पाएगी
