जोशीमठ माफ नहीं करेगा – टूटते घरो से सिसकती आवाज़े

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मीडिया मे सुर्खिया बनने के बाद पक्ष  हो या बिपक्ष हर कोई जोशी मठ जोशी मठ रट  रहा है,  लेकिन पीड़ितो को याद है कि जब उन्हे जरूरत थी जब संकट सुरू हो रहा था तब हर जगह से उन्हे उपेक्षित होना पड़ा था तब राज्य सरकार के मंत्रियो ने भी अपनी ज़िम्मेदारी का पालन किया होता तो पीड़ितो का कुछ तो दर्द कम होता , सोसल मीडिया गवाह है कि इस दौरान जिम्मेदार मंत्री कहाँ किस मंच पर दिख रहे थे ,  मौज कर रहे थे

जोशीमठ को उजड़ने से बचाने के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के बीच पहुंची कांग्रेस नेता अनुकृति गुसाईं रावत ने गढ़वाली बोली मे अपने मन की बात पीड़ित  महिलाओ के सामने राखी और उन्हे अहसास कराया कि संकट कि इस घड़ी मे वे हर कदम पर उनके साथ खड़ी है । और उनके आंदोलन को अपना समर्थन दिया साथ ही यह भी बताने की कोशिश की कि कांग्रेस पार्टी इस वक्त जोशीमठ मे  संकट के साथ खड़ी है , जोशीमठ के लोगों के दर्द के साथ खड़ी है और जोशीमठ को लेकर जो तमाम चुनौतियां हैं उन चुनौतियों का क्या समाधान हो सकता है इसको लेकर भी अलग-अलग स्तर पर अपने स्तर से पार्टी  काम कर रही है और सरकार को भी सुझाव दिए जा रहे हैं

 

जोशीमठ का  दर्द,  टूटते हुए घर , अब दहशत का सबब भी बने हुए हैं लोगों की भावनाएं इन घरों के साथ जुड़ी हुई हैं,  लोगों ने पूरा जीवन जिन घरों में बिताया है अपनी पाई पाई जोड़ कर ये  आशियाने बनाए हैं अब ये  आशियाने जब टूट रहे हैं,  छूट रहे हैं तो जाहिर है कि दिल में दर्द होगा और वह दर्द ऐसा जिसकी भरपाई,  जिस की दवा शायद  ही किसी के पास हो । लेकिन सवाल यही है कि जब संकट का वक्त आया है संघर्ष का वक्त आया है तो इन समस्याओं का समाधान काहीर होगा कैसे ?।

जिस तरीके से घर टूटे हुए हैं उससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों को तकलीफ कितनी हो रही होगी, सवाल सिर्फ घर टूटने का नहीं है बल्कि सवाल इसके बाद आने वाले विकट संकट का भी  है ऐसा संकट जिसके बारे में कभी जोशीमठ की आवाम ने,  जोशीमठ की जनता ने सोचा तक नहीं होगा। बिस्थापन अगर हो भी गया,  रहने के लिए छत  मिल भी गई तो पेट कि आग कैसे बुझेगी जो लोग शहरो से अपना कारोबार समेट  कर इस उम्मीद से अपने पहाड़ो को लौटे थे कि अपनी जन्म भूमि मे ही काम करेंगे उनके सपनों का क्या होगा ? कुछ दिन बाद सांत्वना देने वालों कि भीड़ छट जाएगी फिर जीवन पटरी पर वापस लौटने का संकट,  फिर पाई पाई जोड़कर नया घरौंदा बनाने का संघर्ष ।

उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे सीनियर नेता हरीश रावत हों  या फिर उत्तराखंड कांग्रेस की नौजवान पीढ़ी कि  नेता अनुकृति गुसाईं रावत हो ,  हर कोई सरकार को सुझाव दे रहा है लेकिन सरकार विपक्ष के इन सुझाव पर कितना अमल करेगी यह अभी कहा नहीं जा सकता मगर इतना तो तय है कि आपदा ने इस रूप मे आने से पहले जो संकेत दिये थे उनपर किसी ने अमल किया होता तो शायद ये दिन न देखना पड़ता।  वैसे भी आपदा के लिहाज से जोशिमठ तो न पहला किस्सा है  और न आखिरी – पूरे उतराखंड मे ऐसे न जाने कितने संकेत प्रकृति ने दिये है । जब इन दरारों  कि सुरुवात हो रही थी तब  सब अनसुना कर रहे थे,  सरकार ने तो अनदेखी की  ही , सरकार के मंत्रियो ने भी सिर्फ सीएम के भरोसे इस आपदा को छोड़ दिया और बिपक्ष ने भी समय रहते अपनी भूमिका दिखाई  होती तो सायद दर्द आज कुछ कम होता

 

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