दुधबोली देवी भगवती के समानः भरतवाण

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देहरादून। गुरुकुल कांगड़ी सम विवि के दूसरे परिसर, कन्या गुरुकुल देहरादून के हिंदी विभाग की ओर से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर लोकगीतों में जीवंत मातृभाषाएं विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। जागर सम्राट पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण ने मातृभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन पर अपने विचार रखे। उन्होंने दुधबोली यानि कि मातृभाषा को देवी भगवती की संज्ञा दी। उन्होंने बताया कि जागरों में जो 12 देवियां मानी गई हैं उनमें जो 12वीं देवी हैं उसको भाषा की माता कहा गया है।
हमारे सांयकाल के जागर में बोली का वर्णन मिलता है जो लोकगीतों में मातृभाषाओं की जीवंतता का परिचायक है। चिंता जाहिर करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह के प्रयास बोली या भाषा के संरक्षण को लेकर किये जा रहे हैं उस तरह के प्रयास हमारे यहां नहीं हो रहे हैं। लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए बच्चों को लोक संस्कार तो देने ही होंगे साथ ही सरकार के स्तर पर लोकभाषाओं को पाठ्यक्रमों में भी सम्मलित करना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के सवालों के जवाब भी भरतवाण ने दिए। कर्यक्रम में डॉ निशा ने अपने व्यक्तव्य में बताया कि यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड की बंगाणी, थारू, दारमा, जौनसारी व जाड़ जैसी बोलिया खतरे में हैं जिनके बोलने वालों की संख्या बहुत ही कम बची है। हमें बोलियों व अपनी मातृभाषाओं को संरक्षित करने के लिए उन्हें व्यवहार में लाना होगा। इस दौरान प्रोफेसर रेनु शुक्ला, प्रोफेसर हेमलता, डॉ. निशा यादव, डॉ मृदुला जोशी, डॉ हेमन पाठक, डॉ रीना वर्मा, डॉ बबिता शर्मा, डॉ अर्चना डिमरी, डॉ सुनीति, डॉ सविता आदि शामिल रहे।

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