**“बिना रजिस्ट्रेशन अस्पतालों में ड्यूटी!”

Share Now

उत्तराखंड में 30 PG डॉक्टरों की तैनाती पर बड़ा विवाद, RTI ने खोली स्वास्थ्य विभाग की परतें**

देहरादून।
उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग में अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। RTI से हुए खुलासे ने दावा किया है कि जिन 30 PG चिकित्सकों को सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टर बनाकर सरकारी अस्पतालों में तैनात किया, उनमें से कई के पंजीकरण अधूरे, लंबित या “अनुत्तीर्ण” बताए गए थे।

सबसे बड़ा सवाल —
क्या बिना वैध UMC पंजीकरण के डॉक्टर मरीजों का इलाज कर रहे थे?


RTI का विस्फोटक खुलासा

भीमताल निवासी RTI कार्यकर्ता चंद्र शेखर जोशी द्वारा मांगी गई सूचनाओं में सामने आया कि शासन ने DG Health Uttarakhand की संस्तुति पर 17 मार्च 2026 को 30 PG चिकित्सकों की तैनाती के आदेश जारी किए थे।

लेकिन बाद में मिले दस्तावेजों ने पूरे मामले को विवादों के केंद्र में ला दिया।

RTI के अनुसार,
30 में से 16 चिकित्सकों के PG Registration मामलों में “अनुत्तीर्ण”, अपूर्ण या प्रक्रिया में होने की स्थिति दर्ज थी।

यानी जिन डॉक्टरों को विशेषज्ञ बनाकर अस्पतालों में भेजा गया, उनके कागज़ खुद सवालों के घेरे में थे।


UMC ने साफ कहा — बिना पंजीकरण इलाज नहीं

Uttarakhand Medical Council (UMC) ने RTI के जवाब में नियमों का हवाला देते हुए साफ लिखा —

“Uttarakhand Medical Council Rules, 2004 के तहत बिना UMC पंजीकरण कोई भी चिकित्सक राज्य में चिकित्सकीय कार्य नहीं कर सकता।”

यही नहीं, विशेषज्ञ (PG) डॉक्टर के रूप में काम करने के लिए संबंधित विशेषज्ञता का पंजीकरण भी अनिवार्य बताया गया है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि —
अगर पंजीकरण अधूरा था, तो तैनाती कैसे हुई?


सरकारी अस्पतालों में ‘अधूरे दस्तावेज’ वाले विशेषज्ञ?

दस्तावेजों में यह भी सामने आया कि कई मामलों में नियुक्ति के बाद भी रजिस्ट्रेशन और अभिलेखों की प्रक्रिया जारी रही।

यानी पहले पोस्टिंग… बाद में कागज़!

इस खुलासे के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया से लेकर चिकित्सा हलकों तक चर्चा तेज हो गई है।


“मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़?”

मामले को लेकर लोगों में नाराज़गी बढ़ रही है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पहले ही डॉक्टरों की कमी, रेफरल और बदहाल सुविधाओं के आरोप झेल रही है। ऐसे में अब यह सवाल भी उठ रहा है —

क्या नियमों को दरकिनार कर मरीजों की जान जोखिम में डाली गई?

एक स्थानीय नागरिक ने नाराज़गी जताते हुए कहा—

“अगर आम आदमी के दस्तावेज अधूरे हों तो काम नहीं होता, लेकिन यहां डॉक्टरों की नियुक्ति ही अधूरे रिकॉर्ड पर हो गई?”


अब जांच की मांग तेज

शिकायतकर्ता ने सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

मुख्य मांगों में शामिल हैं:

  • 30 चिकित्सकों के UMC पंजीकरण की जांच
  • “अनुत्तीर्ण” मामलों की समीक्षा
  • नियुक्ति आदेशों की वैधता की जांच
  • जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई
  • भविष्य में बिना UMC पंजीकरण तैनाती पर रोक

विभाग में मची हलचल

सूत्रों के मुताबिक, मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग में फाइलों की दोबारा जांच शुरू हो गई है। कई स्तरों पर दस्तावेज खंगाले जा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है —

क्या उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में नियमों से बड़ा ‘सिस्टम’ हो गया है?

जब अस्पतालों में इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को यह पता चले कि उनके सामने बैठा “विशेषज्ञ” खुद जांच के घेरे में है…
तो भरोसा आखिर किस पर किया जाए?

उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे ये सवाल अब जवाब मांग रहे हैं… और जनता इंतजार में है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!