अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आम जन मानस की पहली प्राथमिकता बनीः डा. प्रकाश चौहान

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देहरादून। उत्तराखंड राज्य में रेशम उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। तकनीक की मदद से संभावित क्षेत्रों में रेशन उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकता है। यह बात सोमवार को उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (यू सैक) की ओर से सर्वे चौक स्थित आईआरडीटी सभागार में रेशम उत्पादन विकास में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस के अनुप्रयोग विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि नेशनल रिमोट सेसिंग सेन्टर हैदराबाद के निदेशक डॉ प्रकाश चौहान ने कही।
उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी वर्तमान में आम जन मानस की पहली प्राथमिकता बन गयी है। उन्होंने कहा कि हमारा देश अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व के उन चुनिंदा देशों में स्थान पा चुका है जो अपने स्पेस कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य बड़े राष्ट्रों के भी स्पेस कार्यक्रमों में सहायता कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम आज अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नासा, यूरोपियन स्पेस एजेन्सी के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। यू सैक ने एनई-सैक शिलांग द्वारा वित पोषित सेरीकल्चर डेवलपमेंट परियोजना में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेशम उत्पादन के लिए उत्तराखंड के सम्भावित क्षेत्रों को मानचित्रों के रूप में उपलब्ध कराया है, जिससे रेशम विभाग को उन अधिक उत्पादन वाले क्षेत्रों को चिन्हित करने में आसानी होगी। यूसैक के निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट ने कहा कि हिमाचल की तरह उत्तराखंड राज्य में कृषि बागवानी के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड राज्य में टसर सिल्क उत्पादन की बेहतर सम्भावनाएं हैं। यहां बांज प्राकृतिक रूप से अत्यधिक मात्रा में पैदा होता है। जिससे टसर सिल्क का उत्पादन किया जाता है। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग से रेशम उत्पादन के लिए उपयुक्त भूमि का चयन सम्भावित क्षेत्रों की उपलब्धता व पहचान कर उपयुक्त प्रजाति के पौधा रोपण और उत्पादन में वृद्वि कर किसानों की आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। उत्तर पूर्वी अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र शिलांग (एनई-सैक) के निदेशक डॉ एसपी अग्रवाल ने कहा कि रेशम उत्पादन के विकास में राज्य को अग्रणी बनाने के लिये तकनीकी का उपयोग करना जरूरी है। उत्तराखंड रेशम विभाग के निदेशक एके यादव ने कहा कि हमारा राज्य मलबरी के क्षेत्र में आगे है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में उत्पादित रेशम के धागे की क्वालिटी में लगातार सुधार हो रहा है। उन्होंने कहा कि ओक टसर का पौधरोपण जोशीमठ, कपकोट, मुनस्यारी और चकराता ब्लॉक में कराया गया है। आने वाले समय में चार तरह के रेशम के पौधों का प्लान्टेशन करने पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मलबरी का चंपावत को छोड़कर अन्य 12 जिलों के 55 विकास खंडों के 719 गांवों में उत्पादन किया जा रहा है। जिससे दस हजार लाभार्थी वर्तमान में लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि सहतूती रेशम पहले 90 मीट्रिक टन उत्पादन होता था, आज 300 मीट्रिक टन उत्पादन कर रहे हैं। इस दौरान कुछ पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर डॉ सुषमा गैरोला, प्रो एबी भट्ट, प्रो एसपी काला, निदेशक मौसम विज्ञान केन्द्र डॉ विक्रम सिंह चौहान, निदेशक यूसर्क प्रो अनीता रावत आदि मौजूद थे।

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