दो गांवों के ग्रामीणों के बीच हुआ गागली युद्ध

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देहरादून। जौनसार-बावर में पाइंता पर कुरोली और उत्पाल्टा के ग्रामीणों के बीच गागली युद्ध चला। यह ऐसा युद्ध है, जिसमें किसी की हार जीत नहीं होती, बल्कि युद्ध के बाद दोनों गांवों के ग्रामीण गले मिलते हैं। युद्ध के बाद उत्पाल्टा का पंचायती आंगन लोक संस्कृति से गुलजार हो गया। महिलाओं ने तांदी, झेंता, रासो नृत्य से समा बांधा। लोक परंपरा के अनुसार मनाए जाने वाले इस पर्व में शामिल होकर ग्रामीणों ने हर्षाेल्लास से दिन बिताया।
शुक्रवार सुबह ग्रामीणों ने दो बहनों मुन्नी और रानी की मूर्तियों की पूजा की और बाद में उन्हें कुएं में विसर्जित किया। उत्पाल्टा व कुरोली के ग्रामीण ढोल नगाड़ों की थाप पर गागली युद्ध के लिए देवधार पहुंचे, जहां पर उन्होंने गागली के पत्ते और डंठल लेकर युद्ध किया। जौनसार के इस अनूठे युद्ध को देखने के लिए आसपास के गांवों से भारी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। कालसी ब्लाक क्षेत्र के कुरोली और उत्पाल्टा के ग्रामीण अपने-अपने गांव के पंचायती आंगन में एकत्र होकर ढोल नगाड़ों और रणसिघे की थाप पर हाथ में गागली के डंठल व पत्तों को लहराते व नाचते गाते नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर देवधार में पहुंचे। युद्ध समाप्त होने पर दोनों गांवों के ग्रामीण गले मिले। उसके बाद उत्पाल्टा गांव के पंचायती आंगन में महिलाओं ने सामूहिक रूप से तांदी, झेंता, रासो नृत्य से समा बांधा। पाइंता पर्व की खुशियां मनाई। इस मौके पर राजेंद्र राय, नरेंद्र राय, कश्मीरी राय, गंभीर सिंह राय, दीवान सिंह राय, अनिल राय, सतपाल राय, पूरण राय, हरी सिंह राय, दिनेश राय, वीरेंद्र राय आदि मौजूद रहे।
किवदंती है कि कालसी ब्लाक के उत्पाल्टा गांव की बैराण व पथान परिवार की रानी व मुन्नी दो बहने थीं। रानी व मुन्नी गांव से कुछ दूर स्थित क्याणी नामक स्थान पर कुएं में पानी भरने गई थीं। रानी अचानक कुएं में गिर गई, मुन्नी ने घर पहुंच कर घटना बताई तो ग्रामीणों ने मुन्नी पर ही रानी को कुएं में धक्का देने का आरोप लगा दिया। इस मिथ्या आरोप से खिन्न खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। ग्रामीणों को बहुत पछतावा हुआ। इसी घटना को याद कर पाइंता से दो दिन पहले मुन्नी और रानी की मूर्तियों की पूजा होती है, पाइंता के दिन मूर्तियां कुएं में विसर्जित की जाती हैं। कलंक से बचने के लिए उत्पाल्टा व कुरोली के ग्रामीण हर वर्ष पश्चाताप के लिए गागली युद्ध करते हैं।

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